भीड़ में जीता हुआ इंसान

Date:

भीड़ बहुत है चारों ओर,

फिर भी मन क्यों तन्हा है?

कंधों पर ढेरों जिम्मेदारियां,

दिल कितना नन्हा है?

 

तुलना की इस दौड़ में देखो,

किसी को सफलता मान चाहिए।

महंगाई जिम्मेदारियां ने बांध लिया,

फिर भी खुला आसमान चाहिए।

 

रिश्तो में हिसाब अपनापन नहीं,

सोशल मीडिया की दुनिया झूठी है।

बच्चों पर सपनों का बोझ है,

परिवार के भार से नींद टूटी है।

 

समाज कहता है ऐसे जीना है,

कंधों पर रिश्तो की उम्मीदों का भार।

दूसरों को खुश करने के चक्कर में,

बेमन से करना पड़ता है व्यवहार।

 

समाज को बदलना मुश्किल है,

चलो हम खुद को ही बदल देते हैं।

जो नियम हमें खुशियां दे,

उन्हें नियमों पर हम चल देते हैं।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img
spot_imgspot_img
spot_imgspot_img
spot_imgspot_img

लेटेस्ट खबरें

गांव-समाज की खबरें
Related

मानव जीवन अनमोल, व्यर्थ न गवाएं, पंकज जी महाराज

मीरजापुर।जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था मथुरा के संस्थापक संत...

पाक्सो एक्ट को लेकर छात्र-छात्राओं को किया जागरूक

  महोली अमृत विचार :उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन...

विजय सैनी     बाइक सवार गिरने के साथ ई-रिक्शा भी पलटे,...

राशन की दुकान में 11 कुंतल अनाज कम मिला, कार्रवाई के निर्देश

  पिसावां/महोली (दि ग्राम टुडे)। ग्रामीणों की शिकायत पर सोमवार...