मत हो अधीर

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मत हो इतना अधीर प्रिये

जरा…,

साँझ को ढ़ल जाने तो दो

निशा जो आ रही -प्रिये

उसे भी जवाँ तो होने दो,

फिर करना अभिसार प्रिये

मत हो इतना अधीर -प्रिये |

जरा…,

तारों को ढ़ल जाने तो दो

शबनम को सो जाने दो

चंद्र किरण को आने तो दो,

फिर करना अभिसार प्रिये

मत हो इतना अधीर -प्रिये |

जरा…,

उनसे खेल तो लेने दो

दो पल को उनको चूम तो लूँ

मदमस्त पवन संग उड़ तो लूँ,

उषा की लाली देख तो लूँ

अंतरमन में उसे समा तो लूँ ,

फिर करना अभिसार प्रिये

मत हो इतना अधीर -प्रिये ||

 

शशि कांत श्रीवास्तव

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