उठते मदद में हाथ जब,
प्रभु होते हैं साथ तब।
मदद करे सुखी हो जीवन,
तभी होता है शांत मन।
परमार्थ करो ये सभी कहें,
मदद के लिए हाथ बढ़े रहें।
जरुरत मंद की मदद करना,
आगे बढ़कर प्रेम भरना।
सत्य अहिंसा परमोधर्म है,
दीन की मदद स्वधर्म है।
ये परम्परा हमारी सनातन रही
ग्रहस्थ आश्रम ही बड़ा रहा।
मदद के लिए उठने वाले हाथ,
देश समाज सबके रहते साथ।
वह प्राणी कभी अकेला नहीं,
कारवां उसके संग चलता वही।
स्वरचित
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश






