घर का सिर्फ एक कोना नहीं,
यादों का संसार है मेरा आंगन।
जहां हर सुबह महकती है,
और शाम हंसी में ढल जाती है।
मेरे इस घर के आंगन में,
बच्चों ने गिरना उठना सीखा।
बचपन की शरारतें यहां पर,
मिट्टी में खुशियां बिखरी है।
आंगन में तुलसी का चौबारा,
पंछियों की मधुर चहचहाहट।
सोने सी सुनहरी खिलती धूप,
और बारिश की पहली फुहार।
त्योहारों में सजता मेरा आंगन,
दीपों से जगमगाता है।
यहां होती अपनों की बातें,
सब का दर्द बांट जाता है।
घर के बाहर भीड़ में,
कितना भी वक्त बीत जाता है।
पर अपने आंगन जैसा सुकून,
मुझे कहीं नहीं मिल पाता है।
मेरा आंगन जड़ों की पहचान है,
यह मेरे सपनों का आसमान है।
आंगन से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं,
यहां मेरे अपनों की छांव है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






