संस्कृत की पावन गोद से, निकली भाषा न्यारी,
जन-जन के अधरों पर बसती, हिंदी सबसे प्यारी।
ऋषियों की वाणी से लेकर, संतों के विचार,
कवियों ने इसके आँचल में, भर दिए रंग हजार।
तुलसी की चौपाई बोली, सूर ने प्रेम सुनाया,
कबीरों ने सच की राहों का, दीपक खूब जलाया।
भारत की मिट्टी की खुशबू, हिंदी में मुस्काती,
दूर देश में भी इसकी अब, पहचान बन जाती।
यह केवल भाषा ही नहीं, भारत का सम्मान,
इसके अक्षर-अक्षर में बसता, अपना हिंदुस्तान।
माँ के मीठे बोलों जैसी, सरल, सहज, सुखदायी,
दुख में आँसू पोंछे हिंदी, सुख में बने बधाई।
विश्व-पटल पर बढ़ता जाए, हिंदी का उजियारा,
हर भाषा का मान रहे, फिर भी हिंदी हो प्यारा।
हम सब मिलकर इसे सँवारें, इतना करें प्रयास,
हिंदी साहित्य सदा जीवित हो, यही रहे विश्वास।
आने वाली पीढ़ी के हाथों, इसका दीप जलाएँ,
हिंदी के गौरव को लेकर, दुनिया तक पहुँचाएँ।
हिंदी केवल शब्द नहीं है, हिंदी अपना मान,
हिंदी से ही जीवित रहेंगे, भारत के अरमान।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
चन्दौसी जनपद संभल






