वो सैकड़ों दर्द लिए था
अस्सी साल के एक बुजुर्ग की मौत हो जाती हैं , उसकी मौत पर बेटे के घर आंगन में दस्तक देते लोग देखे, अरे केल तो घूमते हुए देखे मुझे, कैसे हो गया, बेटा, हां आज भी घूम कर आए खाना खाया रोज का तरह सो गए ठिक थे, ठीक थे यह कहना कितना आसान लगता हैं न, पर हकीकत कुछ और होती हैं, वह अस्सी साल का बूढ़ा इस धोर कलयुग में,जीने लगा हुआ था उन्हीं के लिए जिन्होंने कभी उसका ईमानदारी से ख्याल नहीं रखा होगी, पता नहीं कितनी बार उसे अपमान सहन किया होगा कितनी बार भूखा सो गया होगा
कितनी बार छोटी बड़ी तकलीफ में कभी कुछ नहीं बोलता हुआ सह जाता होगा कितनी बार कितना कुछ बल्कि रोज़ रोज़ कुछ सहता होगा घर की बात है साहब घर वालों को बोलना याने और सजा भुगतना होगी बाहर बोलना याने घर की इज्जत का सवाल है सब अपने है अच्छा नहीं लगेगा, चुप रहो बस कोशिश करो कोई दर्द आखरी सांस में नहीं बदल जाय जीना है न अपने है बहुत काम आ रहे हैं यह अपने बोलते नहीं तो क्या वह तो समझता था और अपनों के लिए रोज़ रोज़ मरता और ईश्वर से प्रार्थना कर उन्हें माफ़ करें नादान है वो सभी कहता जी रहा था
ठीक तो वह था ही नहीं ठीक हुं सदा ही बताया करता था ताकि किसी को कोई पीढ़ा न हो किसी को जय पीढ़ा न हो यही सोच वह सैकड़ों पीड़ा लिए जी रहा था आज शायद ऐसी ही कोइ पीड़ा उसके जिम्म की जर्जर काया सहन नहीं कर सकी और उसे सदा के लिए और भी सैकडो दर्द बिना बताए सब अपने साथ लेकर दफन हो गया सदा के लिए इस कलयुगी दुनिया से मुक्त हो कर एक अजीब तेज़ लिए चेहरे पर जैसे कभी कोई तकलीफ नहीं थीं
कहां है ऐसे विरले लोग इंसान देवत्व इंसान शायद नहीं है या शायद चंद है,राम जाने साहब
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश






