सुंदरता ईश्वर की अनुपम, सृष्टि-सृजन का सार है, तन की आभा से भी बढ़कर, मन का निर्मल प्यार है।
सुंदरता वह, जहाँ हृदय में श्रद्धा के दीप जलें, आँखों में सम्मान जगे और भाव पवित्र पलें।
आकर्षण और सुंदरता में, अंतर समझना होगा, देह से आगे बढ़कर मन का दर्पण पढ़ना होगा।
सौंदर्य अगर मर्यादा में हो, संस्कृति का शृंगार है, मर्यादा जब टूटने लगे, प्रश्नों का अंबार है।
फैशन करना दोष नहीं, पर विवेक भी साथ रहे, अपनी संस्कृति, अपने मूल्य, हृदय के आसपास रहें।
तन की सुंदरता क्षणभंगुर, मन की सुंदरता चिरकाल, रूप ढलेगा, रंग ढलेगा, मिट जाएगा तन का जाल।
अंग-प्रदर्शन से ही क्या सौंदर्य प्रमाणित होगा? क्या तन के आकर्षण से ही व्यक्तित्व प्रतिष्ठित होगा?
आधुनिकता का अर्थ नहीं, हर सीमा को लाँघ चलें, प्रगति वही, जिसमें हम अपनी जड़ों को साथ रखें।
पाश्चात्य का अंधानुकरण अपनी पहचान न खोए, नवयुग की हर एक उपलब्धि, विवेक के संग संजोए।
सुंदरता वह नहीं, जिससे बस आँखें ठहर जाएँ, सुंदरता वह है, जिससे मन में श्रद्धा के फूल खिल जाएँ।
नारी हो या नर, हर तन का अपना सम्मान रहे, रूप के साथ विचारों में भी गरिमा और स्वाभिमान रहे।
याद रहे, सौंदर्य का सच्चा अर्थ यही कहलाए— तन आकर्षित भले करे, मन आदर पाना चाहे।
डॉ दीपा शर्मा उजाला
फरीदाबाद






