कई वर्षों बाद फिल्म देखने टॉकीज गया। जाने का कोई विशेष कारण नहीं था, बस इतना जानता था कि फिल्म हनुमान अंश हनुमान जी और प्रभु राम की आस्था से जुड़ी है। मन ने कहा—देखना चाहिए। फिल्म शुरू हुई तो लगा, यह केवल पर्दे पर चलती कहानी नहीं है; यह धीरे-धीरे भीतर उतरता हुआ एक सवाल है—हम भगवान को कितना मानते हैं और उनके बताए जीवन-मूल्यों को कितना जीते हैं?
फिल्म की कथा, प्रस्तुति, अभिनय और निर्देशन दर्शक को बांधे रखते हैं, लेकिन इसका प्रभाव केवल कहानी तक सीमित नहीं रहता। फिल्म आस्था के उस पक्ष को सामने लाती है, जहां भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि व्यवहार बन जाती है।
हम ईश्वर को मानते हैं। मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं। लेकिन उसी मन में कभी किसी के लिए ईर्ष्या होती है, किसी के लिए द्वेष, किसी के प्रति ऊंच-नीच का भाव और किसी के लिए अपना-पराया। तब मन ठहरकर पूछता है—क्या ईश्वर केवल हमारे मंदिरों में हैं?
यदि ईश्वर सर्वत्र हैं, तो फिर उस पेड़ में भी होंगे जो हमें छाया देता है, उस नदी में भी जो हमारी प्यास बुझाती है, उस पक्षी में भी जो सुबह हमारे आंगन में आकर चहकता है और उस पशु में भी, जो बिना किसी अपेक्षा के मनुष्य के आसपास अपना जीवन जीता है।
यही विचार फिल्म देखते हुए बार-बार मन में उठता रहा।
हनुमान जी की भक्ति में केवल शक्ति नहीं, समर्पण है। प्रभु राम के चरित्र में केवल विजय नहीं, मर्यादा और करुणा भी है। इसलिए राम और हनुमान को मानने का अर्थ केवल उनका नाम लेना नहीं, बल्कि उनके जीवन से निकले मूल्यों को अपने आचरण में उतारना भी है।
आज धर्म हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन कई बार धर्म के नाम पर मनुष्य मनुष्य से दूर भी होता दिखाई देता है। ऐसे समय में यह समझना जरूरी है कि सच्ची आस्था किसी के प्रति घृणा नहीं सिखाती। वह मन को विनम्र बनाती है, दृष्टि को व्यापक करती है और जीवन में करुणा पैदा करती है।
फिल्म ने मुझे अपने उन विचारों की भी याद दिलाई, जिन्हें मैं लंबे समय से प्रकृति और जीव-जगत के संदर्भ में महसूस करता आया हूं। मनुष्य स्वयं को इस धरती का स्वामी समझने लगा है, जबकि वह इस विशाल सृष्टि का केवल एक हिस्सा है। पेड़, पौधे, पशु-पक्षी, नदियां, पहाड़—सब मिलकर इस संसार को पूर्ण बनाते हैं।
हम प्रकृति को बचाने की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन प्रकृति के प्रति प्रेम हमारे व्यवहार में कितना है, यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है।
शायद भगवान की पूजा का एक अर्थ यह भी है कि उनकी बनाई हुई सृष्टि का सम्मान किया जाए।
हनुमान अंश की यही अनुभूति मुझे सबसे अधिक छू गई। फिल्म देखने के बाद लगा कि धार्मिक कथा का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह हमें अपने जीवन को थोड़ा बेहतर बनाने की प्रेरणा दे।
रामराज्य की कल्पना भी केवल सत्ता या व्यवस्था की कल्पना नहीं हो सकती। उसके मूल में न्याय, करुणा, मर्यादा, सुरक्षा और लोककल्याण जैसे मानवीय मूल्य हैं। जब समाज में मनुष्य दूसरे मनुष्य के दुख को समझेगा, कमजोर के साथ खड़ा होगा, प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशील होगा, तभी उन मूल्यों का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।
कई वर्षों बाद फिल्म देखने का यह अनुभव इसलिए भी अलग रहा कि टॉकीज से बाहर निकलते समय फिल्म की कहानी से अधिक उसके विचार साथ थे।
मन में एक शांत-सा भाव था।
शायद अच्छी फिल्म वही होती है जो खत्म होने के बाद भी मन में चलती रहे। हनुमान अंश ने मेरे भीतर यही किया। उसने आस्था को फिर से एक सरल अर्थ में समझने का अवसर दिया—ईश्वर को मानना केवल माथा टेकना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में प्रेम, करुणा और मर्यादा को स्थान देना भी है।
यदि हम सचमुच मान लें कि ईश्वर कण-कण में है, तो शायद दुनिया को देखने का हमारा नजरिया ही बदल जाए। फिर किसी मनुष्य को छोटा समझना कठिन होगा, किसी जीव को व्यर्थ समझना कठिन होगा और प्रकृति को केवल अपने उपयोग की वस्तु मानना भी कठिन होगा।
फिल्म समाप्त हुई, पर्दा गिर गया, रोशनी जल गई और दर्शक अपने-अपने घर लौट गए। लेकिन मेरे भीतर एक विचार देर तक रोशनी की तरह बना रहा—
राम को जानना शायद कथा जानना है,
राम को मानना जीवन में मर्यादा लाना है।
हनुमान अंश के लिए मन से यही भाव निकलता है—
सादर नमन। जय हनुमान।
~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत” छत्तीसगढ़






