_अशोक वाटिका में बैठी सीता मन में कहती है_
स्वर्ण-मृग की एक भूल का युग-युग दंश सहती है।
राम सामने थे जब मेरे,
फिर क्यों मृग-माया भा गई,
एक स्वर्ण की चाहत मुझको
स्वर्ण-लंका में ला गई।
जिसने राजमहल ठुकराया,
वन का पथ अपनाया था,
उस मन में फिर स्वर्ण-मोह का
बीज कहाँ से आया था।
कंचन की उस झूठी आभा ने
विवेक मेरा हर डाला था,
एक क्षणिक आकर्षण ने ही
जीवन भर का दंश दे डाला था।
इच्छा रख दी राम के आगे,
हठ से लक्ष्मण दूर किया,
अपने ही हाथों मैंने क्यों
अपना संसार चूर किया।
रावण की क्या बिसात थी
मुझ पर आँख उठा पाता,
राम के रहते सीता पर
कटु दृष्टि वो डाल पाता।
दोषी केवल वो दुष्ट नहीं था,
दोषी मेरा मोह भी था,
स्वर्ण-मृग नहीं, वह मेरे मन का
क्षणिक लोभ ही तो था।
आज इसी अशोक तले मैंने
खुद से एक सवाल किया,
कंचन की झूठी चमक पर
क्यों जीवन अपना वार दिया।
सोना चाहे महल सजाए,
मन का शून्य ना भर पाए,
प्रेम जहाँ हो वही अयोध्या,
मोह जहाँ हो लंका आए।
हे नारी! मेरी पीड़ा को
मात्र कथा मत समझ लेना,
छल की चमक जहाँ भी दिखे
वहाँ विवेक मत खो देना।
जिस धन के पीछे मर्यादा,
प्रेम और विश्वास चले जाए,
ऐसे स्वर्ण को त्याग देना
चाहे जग के ताज मिल जाए।
आज नहीं मैं केवल सीता,
हर युग की नारी हूँ,
अपने ही अनुभव की अग्नि से
बोल रही चिंगारी हूँ।
दोष मेरा यही था मैंने
क्षण भर स्वर्ण को सत्य समझ लिया,
राम के सामने मृग-तृष्णा को
प्रिय समझ लिया।
हे रघुवर! क्षमा, अपराध ये
मन क्षण भर भरमाया था,
पर अब जान गई हूँ सच्चा
जगत में प्रेम तुम्हारा पाया था।
स्वर्ण-मृग की चाहत छोटी
पर उसका दंश बड़ा था,
एक पल का मोह था
युगों का जिसने घाव दिया था।
डॉ दीपा शर्मा उजाला
फरीदाबाद






