विषय– गजल सृजन
काफिया — आई की बंदिश
रदीफ़-में।
तुम्हारी बेवफ़ाई भी मिली थोड़ी रुबाई में,
उन्हीं की याद आती है हमें फिर से तन्हाई में।
उन्हीं खामोशियों में छिप गये थे कुछ गिला गहरे,
वही अब गुँजते दिल में अदाएं बन हँसाई में।
वही पहली मुलाकाती महक जी में समाती है,
रहा सूना कभी दिल भी वहीं से आशनाई में।
कभी तुम साथ चलते थे वहीं तुम दूर हो मुझसे,
वहां से लौट अब आओ बता दो इस जुदाई में।
बहुत कुछ कह गई आँखें मगर लब चुप रहे फिर भी,
कहीं लौटें वही स्वर फिर अकेले की रुलाई में।
वही टूटी हुई धुन आज भी मन को पुकारे है,
कई मौसम गुजरते हैं इसी गहरी विदाई में ।
‘सुरभि’ ने दर्द को सींचा तभी फूला खिला रिश्ता,
मगर कुछ रंग रह जाते बने जीवन मिलाई में।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार






