सावन-भादो

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सावन-भादो गरज बरसकर, जियरा खुब तड़पायो।

राह तकत अब साँझ भई है, पिया घरे नहिं आयो।।

 

घन-घोर घटा घिरि आई, बिजुरी चमकै अँगनाई।

भीजि गई चुनरी तन की, न मन की प्यास बुझाई।।

कोयल कूक-कूक कर पूछे, पिय कै ख़बर न पायो।

सावन-भादो गरज बरसकर, जियरा खुब तड़पायो।।

 

बागन माहिं पर्यो है झूला,सखियाँ झूलैं मतवाली।

मोरे नैनन नीर भरत हैं, बिरहा कसक सम्हाली।।

पवन चली पुरवाई बनकर, तबहुं संदेशा न आयो।

सावन-भादो गरज बरसकर, जियरा खुब तड़पायो।।

 

दीप जला कर द्वार मैं बैठी, हैं पंथ निहारत नैना।

एक घड़ी भी युग-सी लागे, कैसे काटूँ अब रैना।।

मन कहता पिया लौटिहैं, आस न कबहुँ भुलायो।

सावन-भादो गरज बरसकर, जियरा खुब तड़पायो।।

 

‘शिव’ कहे सावन सुखदायी, जो पिया रहें संग मेरे।

उनहिं बिना हर ऋतु काटति है, संझा अउर सबेरे।।

बरखा बरसै चुवय पसीना, सूखत मन न सरसायो।

सावन-भादो गरज बरसकर, जियरा खुब तड़पायो।।

कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती रायबरेली-२२९३०६

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