दिल को छू जाए जो,
वो बात कहाँ होती है,
हर मोहब्बत लफ़्ज़ों में
बयान कहाँ होती है।
कुछ रिश्ते ख़ामोशी में ही
पलते हैं उम्रभर,
हर धड़कन की कोई ज़ुबान
कहाँ होती है।
जिसे चाहो, वही दिल में
उतर जाता है अक़्सर,
हर चाहत की मगर मुक़म्मल दास्तान कहाँ होती है।
हमने तो तुम्हें अपनी
धड़कनों में रख लिया,
दिल में बसे लोगों की कोई पहचान कहाँ होती है।
तुम दूर हो फ़िर भी
साँसों के पास लगते हो,
मोहब्बत में दूरियों की
भी दीवार कहाँ होती है।
दिल टूटे तो आवाज़ नहीं होती कभी,
कुछ दर्द की कोई सुनाई देने वाली पुकार कहाँ होती है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’






