हास्य

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यमलोक में यमराज मित्र का श्राद्धपितृपक्ष का पहला दिन भी नहीं बीता था कि मित्र यमराज बिना किसी पूर्व सूचना के टपक पड़े। आते ही धर्म-पूर्वक जमकर जलपान किया और घोड़ा बेचकर सो गए। चार घंटे बाद उठे तो बिना किसी शर्म-संकोच के चाय मँगवाई और फरमाया –
“प्रभु!, मेरे मन में बड़ी ख्वाहिश है कि एक श्राद्ध-भोज का आयोजन किया जाए, जिसमें आपको भी आमंत्रित किया गया है। इस पर आपका क्या विचार है?”
मैंने कहा – “मेरे विचार का तेरे लिए कोई मतलब ही नहीं है, तो मेरे कुछ कहने का फायदा ही क्या है?”
“क्या प्रभु, आप तो निराश हो गए! ऐसा भी कहीं होता है?”
“अरे यार, छोड़ो। होता है या नहीं होता है, यह सब बाद की बातें हैं। फिलहाल तू अपनी योजना बता और मुझे क्या करना है, यह भी बता।”
यमराज बड़े प्यार से बोला – “प्रभु, आपको तो कुछ नहीं करना है। जो कुछ करना है, सब मेरे चेले-चपाटे कर लेंगे। बस आपको यमलोक चलकर अपना श्राद्ध का भोज खाना है, कविता सुनानी है और फिर प्रेम से वापस आ जाना है।”
इतना सुनते ही मुझे गुस्सा आ गया – “भला ऐसा भी कहीं होता है? क्या यमलोक में भी श्राद्ध होता है?”
“यह तो मुझे भी पता है प्रभु! कि यमलोक में श्राद्ध नहीं होता। पर आप तो जीवित हो, धरती लोक पर हो। इसीलिए तो आपका श्राद्ध करने का मन कर रहा है। इसी बहाने एक नया इतिहास बन जाएगा। यमलोक में भी श्राद्ध हो जाएगा और मेरे चेले-चपाटों के साथ यमलोकी आत्माओं को भी श्राद्ध-भोज का आनंद मिल जाएगा।”
मैंने अपना माथा पीट लिया – “अरे यार, तू तो मुझे फँसा ही देता है।”
“अच्छा चल, अगर मैं तेरी बात मान भी लूँ तो तू बता – अभी तो मेरी शोक-सभा भी नहीं हुई है। तू क्या चाहता है कि बिना शोक-सभा के ही मेरा श्राद्ध हो जाए? तेरे इतिहास लिखने के चक्कर में बिना शोक-सभा के ही मेरा काम तमाम हो जाए और मैं यमलोक पहुँच जाऊँ, अपना श्राद्ध खुद ही खाऊँ और साथ में तेरी यमलोकी आत्माओं को भी खिलाऊँ? क्या मैं तुझे बेवकूफ लगता हूँ?”
“नहीं प्रभु! भला मेरी इतनी औकात जो मैं आपको बेवकूफ समझूँ। आपकी समस्या का हल मैं तत्काल देता हूँ। आपको यमलोक चलने का निमंत्रण देता हूँ। आप शोक-सभा की चिंता क्यों करते हैं? श्राद्ध से पहले यमलोक में ही आपकी शोक-सभा भी करवा देता हूँ।”
उसकी बात सुन मैंनें भी हथियार डाल देने की मुद्रा में कहा- “चल भाई, जैसी तेरी इच्छा। मगर मेरी एक बात ध्यान से सुन ले – मैं तेरे साथ चलूँगा तो, मगर लौटूँगा अपने मन से। अब इस पर अगर तुझे कोई एतराज न हो तो बता।”
यमराज मुस्कराया और बोला – “वाह प्रभु! आपने तो मुझे ही फँसा दिया, यार होने का पूरा आनंद ले लिया। मगर कोई बात नहीं। जब तक इच्छा हो, आप वहीं रहना। जो करना हो, वही करना। इच्छा हो तो आना और न इच्छा हो तो वहीं बस जाना। आपकी सेवा के लिए दो-चार दूत लगा दूँगा, कविता लिखने के लिए एक मुंशी बैठा दूँगा। आप कहोगे तो हमेशा के लिए एक कवि-मंच सजवा दूँगा। जब मन करे कविता करना और जब मन करे सो जाना। फिर भी मन उचट जाए तो जहाँ मन चाहे घूम-फिर कर वापस आ जाना।”
यमराज की बात सुन मैं मन ही मन मुस्कुराया और बोला – “तो तू आज देर रात आना और मुझे ले चलना।”
यमराज चौंक गया – “मगर ऐसा क्यों प्रभु?”
“ऐसा इसलिए कि इसी में तेरी भलाई है। तुझे पता है कि घर में तेरी भौजाई है। हम दोनों के लिए यही अच्छा है कि जो करना है, चुपचाप करना है। कानों-कान किसी को खबर नहीं होनी चाहिए, वरना वह भी साथ आ जाएगी और तेरी सारी योजना धरी की धरी रह जाएगी।”
यमराज ने गहरी साँस ली और प्रणाम कर प्रस्थान किया। उसके जाते ही मैं खुशी से उछल पड़ा – मजा आ जाएगा। जीते जी धरती पर रहते हुए यमलोक में मेरा श्राद्ध-भोज हो जाएगा, यह भी एक इतिहास बन जाएगा। वैसे भी इस कलयुग में क्या पता, मेरी शोक-सभा और श्राद्ध-भोज होगा भी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यमराज के भरोसे कम से कम इतना तो पक्का हो जाएगा।
वादे के अनुसार रात के दो बजे यमराज सचमुच आ गया। मैं चुपचाप उसके भैंसे पर बैठकर यमलोक पहुँच गया। वहाँ देखा तो दृश्य अद्भुत था – चित्रगुप्त हिसाब-किताब छोड़कर माइक संभाले थे, यमदूत पत्तलें लगा रहे थे।
मेरी ही तस्वीर पर माला टँगी थी और नीचे लिखा था – “जीवित पितर यमराज मित्र का प्रथम श्राद्ध।”
शोक-सभा हुई। यमराज ने ही मेरा शोक-गीत पढ़ा। फिर श्राद्ध-भोज शुरू हुआ। मैंने खुद अपने ही श्राद्ध की पूड़ी-सब्जी, खीर खाई और यमलोकी आत्माओं को कविताएँ सुनाईं।
भोज के अंत में मैंने यमराज से कहा – “मित्र, तृप्ति तो बहुत हुई, पर अब दक्षिणा में मुझे वापस धरती लोक भेज दे।”
यमराज बोला – “प्रभु, आप पहले ऐसे जीवित प्राणी हैं जिन्होंने अपना श्राद्ध खुद खाया है। जाइए, इतिहास बन गया। जब तक पितृपक्ष है, आप अमर कथा बन गए।”
और मैं हँसता हुआ वापस अपने बिस्तर पर आ लेटा। सुबह श्रीमती जी ने पूछा – रात भर कहाँ थे, जो इतना खुश नजर आ रहे हो?
मैंने कहा – “यमलोक घूमने गया था, अपना श्राद्ध खाकर वापस आ रहा हूँ।”
इतना सुनते ही श्रीमती जी बेहोश हो गईं। तत्काल यमराज को फोन लगाकर सूचना से अवगत कराया।
वो हँसते हुए बोला – चिंता मत करो प्रभु! बस उनके कान में धीरे से कहा दो, मैं आ रहा हूं, चाय के साथ पकौड़ी भी बना लें।
जैसे ही मैंने ये बात उनकी कान में कहीं कि साक्षात चंडी दर्शन का लाभ मिला और मैंने भागकर किसी तरह जान बचाई।
वो चीखती रही – नासपीटे! अब मेरे घर में तुम दोनों घुसना भी मत। वरना दोनों का श्राद्ध एक साथ कर दूंगी। और कुत्तों का भोजन करा दूंगी।
यमराज यमलोक से यह दृश्य देखकर मुस्कुरा रहा था और मैं अपने भविष्य पर विचार करने को विवश था। मगर राह नहीं पा रहा था।
जय हो पितृगणों, यमलोकी आत्माओं , पितृपक्ष और अपने यमलोकी श्राद्ध की भी।

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश

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