अखंड संडे साहित्यिक संस्था के सक्रिय सहयोगी पंडित अरुण कुमार अवस्थी को सदैव याद किया जाएगा। दिनांक 25 सितंबर 2025 को ब्रह्मलीन हुए। जीवन पर्यंत सरस्वती साधना और सनातन धर्म के प्रति समर्पित रहे।
एक माह पूर्व गिरने से पैर में फ्रैक्चर हुआ । ऑपरेशन सफल रहा और वाकर के सहारे घर में चलकर ,अपनी सब गतिविधियों को, दिनचर्या को सुचारू चला रहे थे । 25 सितंबर को प्रातः 9:00 बजे साइलेंट हार्ट अटैक से, अचानक परिवार को रोता विलखता छोड़ गए। सभी साहित्यिक और सामाजिक मित्रों के, लोकप्रिय अरुण अवस्थी का आकस्मिक वियोग ,गहन दुख दे गया।
ब्रह्मलीन पंडित अरुण कुमार- लक्ष्मी नारायण- दीनदयाल अवस्थी जी के व्यक्तित्व में योग ,भक्ति ,समरसता का अनूठा समन्वय रहा । सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों में अग्रणी रहते थे। ईश्वर साधना करते ,लेखनी चलाते रहे । “शिक्षा दान महादान “उक्ति को जीवन में चरित्रार्थ किया। लाइट चिल्ड्रन स्कूल और निशुल्क कोचिंग कक्षा के माध्यम से शिक्षा दान करते रहे। प्रातः भ्रमण को नियमित जाते थे। मॉर्निंग वॉक क्लब रेजिडेंसी के योगासन, हास्य कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका निभाते थे। क्लब के संस्थापक स्वर्गीय बलवीर सिंह छाबड़ा ‘वीर जी ‘के परम सहयोगी रहे। अखंड संडे साहित्यिक संस्था के संस्थापक स्वर्गीय सज्जन जैन जी के साथ, नेहरू पार्क में होने वाली प्रत्येक रविवार की कवि गोष्ठी में सक्रीय सहयोगी रहे । अन्य साहित्यिक मंचों पर भी जोशीला काव्य पाठ, सदैव याद किया जाएगा । मिलनसार स्वभाव, फक्कड़ जीवन शैली उनकी पहचान रही।’ राम चरित्रमानस ‘को नियमित पढ़ते थे । घर आए मेहमान का गर्म जोशी से स्वागत करना, उनकी प्रवृत्ति थी। गरीबों को वस्त्र व आवश्यक सामग्री देना, उन्हें अच्छा लगता था। सनातन संस्कृति के संरक्षण में ब्राह्मण धर्म का निर्वाह जीवन पर्यंत करते रहे । रामेश्वरम, शिरडी ,वैष्णो देवी तीर्थ स्थानों के, भ्रमण के संस्मरण सुनाते थे। जो भुलाए नहीं जा सकते, प्रभु श्रीराम के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे। सुंदरकांड की प्रतियां वितरित करते रहते थे। अपने पिता स्वर्गीय लक्ष्मी नारायण अवस्थी- प्रसिद्ध साहित्यकार की विरासत को आगे बढ़ाते रहे।
पत्नी डॉ.शशिकला अवस्थी को भी आगे बढ़ाने में सहयोग दिया। अपने पुत्रों- आलोक और आकाश को खूब पढ़ाया। भारतीय स्टेट बैंक में दोनों पुत्र और पुत्रवधूए कार्यरत हैं । सबको बड़े गर्व से बताते थे।
हिंदी परिवार साहित्यिक संस्था, अवध साहित्यिक संगठन ,अभिरुचि साहित्यिक संस्था ,मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर, साहित्य कलश संस्था ,अखंड संडे साहित्यिक संस्था, कान्यकुब्ज विद्या प्रचारिणी सभा अनेक संस्थाओं से जुड़कर सेवाएं देते रहे। सभी की ओर से उन्हें श्रद्धा सुमन -श्रद्धांजलि अर्पित है।






