खिड़की पर ठहरी शाम,
मुझे देखकर मुस्कुराती है।
सूरज की आखिरी किरण,
आसमान में मिल जाती है।
हवा ने छूकर मेरे मन को,
कुछ अनकही बातें कही।
पंछियों के लौटते...
पितृपक्ष में
घर का बंद संदूक
जाने क्यों
कुछ अधिक अपना लगता है।
कपड़ों के बीच दबी
पुरानी गंध
चुपके से उठती है
और कमरा
किसी भूले हुए स्पर्श से भर जाता...