विविध

रिश्तों के इस मरु काल में एक वटवृक्ष के रूप में हैं डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय जी

एक संस्मरण- आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक (सहारनपुर की एक आत्मीय भेंट) इस भाग-दौड़ भरे युग में जब जीवित रिश्ते भी बोझ लगने लगे हैं, वहाँ...

क्या है कविता

कविता, कवि की है आत्मजा! या सूर्य-रश्मि की सविता है, गंगोत्री के पावन कण जैसी शब्दों की बहती सरिता है! 'कविता' में 'क' की कोमलता 'वि' से विचार, धारा-प्रवाह, 'ता'...

प्रभाती वंदन के साथ चंद दोहा मुक्तक 

कहती हूंँ अति प्रेम से, गणपति लो संज्ञान। आए हो संसार में,श्रेष्ठ बनी पहचान। बढ़ा हुआ व्यभिचार है, उत्सर्जन पर रोक, करो व्यवस्था दूर यह, मांँग रही...

भगवान विश्वकर्मा पर कविता

रचना - *डॉ अनमोल कुमार*   जय हो विश्वकर्मा बाबा, जय हो शिल्पकार, तुमने ही रचा है ये सारा संसार।   हाथ में हथौड़ा, माप का है पैमाना, तुम्हारे ही...

पत्थर में बीज पड़े न उगता पेंड़ है

इच्छाएं वह अच्छी हैं जिनके लिए स्वाभिमान गिरवी नहीं रखना पड़ता है, मुश्किलों को अपनों के बीच रख दो, तभी तो कौन अपना है पता चलता है।   इंसान...

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