किसी स्वतंत्र राष्ट्र में उसकी स्वतंत्रता के साढ़े सात दशक बाद भी उसकी राजभाषा की स्थिति पर विचार करने की आवश्यकता पड़े, तो यह निश्चित रूप से चिंतन और चिंता का विषय है। प्रश्न उठता है कि हिन्दी की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन क्यों करना पड़ रहा है? उसकी अस्मिता पर प्रश्नचिह्न क्यों दिखाई दे रहे हैं? इसका एक बड़ा कारण यह है कि संवैधानिक रूप से सम्मान प्राप्त होने के बावजूद हिन्दी को व्यवहार में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी वह अधिकारिणी है।
14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। हिन्दी निस्संदेह एक समृद्ध और सशक्त भाषा है। इसकी सरलता, व्यापकता, वैज्ञानिकता, विकासशीलता, विशाल साहित्य-संपदा तथा नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता इसे समर्थ भाषा बनाती है। विज्ञान, राजनीति, दर्शन, धर्म, संस्कृति, चिकित्सा और कानून जैसे अनेक क्षेत्रों में हिन्दी में विपुल साहित्य उपलब्ध है।
इसके बावजूद विडम्बना यह है कि अपने ही देश में हिन्दी आज अंग्रेजी के प्रभाव से संघर्ष कर रही है। स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी उच्च शिक्षा, प्रशासन, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। अंग्रेजी बोलना आज भी शिक्षित और प्रतिष्ठित होने का प्रतीक समझ लिया जाता है। यह स्थिति केवल भाषा की नहीं, बल्कि मानसिकता की समस्या है।
हिन्दी भाषी परिवारों में भी अंग्रेजी माध्यम शिक्षा को लेकर एक प्रकार का आकर्षण दिखाई देता है। अनेक माता-पिता अपने बच्चों को हिन्दी से दूर और अंग्रेजी के अधिक निकट ले जाने को आधुनिकता और सफलता की पहली सीढ़ी मानते हैं। परिणामतः बच्चा अपनी मातृभाषा में सहज होने के बजाय अंग्रेजी शब्दावली को अपनी पहचान का हिस्सा समझने लगता है। हिन्दी बोलने में संकोच और अंग्रेजी बोलने में गर्व की मानसिकता हिन्दी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
भाषा के इस बदलते स्वरूप का एक उदाहरण ‘हिंग्लिश’ के बढ़ते प्रयोग में देखा जा सकता है। मीडिया, विज्ञापन, मनोरंजन और सोशल मीडिया में हिन्दी के साथ अंग्रेजी का अनावश्यक मिश्रण लगातार बढ़ रहा है। भाषा का स्वाभाविक विकास अपनी जगह है, लेकिन जब अपनी भाषा के सहज और प्रचलित शब्दों के स्थान पर केवल दिखावे के लिए विदेशी शब्दों का प्रयोग होने लगे, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि हम भाषा को समृद्ध कर रहे हैं या उसके आत्मस्वरूप को कमजोर कर रहे हैं।
तकनीकी युग में हिन्दी के सामने एक और चुनौती उसकी लिपि को लेकर है। सोशल मीडिया पर हिन्दी का रोमन लिपि में बढ़ता प्रयोग सुविधाजनक भले ही प्रतीत हो, लेकिन देवनागरी हिन्दी की अपनी विशिष्ट पहचान है। इसलिए डिजिटल युग में हिन्दी को तकनीक से जोड़ते हुए देवनागरी के प्रयोग को भी प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
विडम्बना यह भी है कि अनेक सरकारी कार्यालयों में ‘हिन्दी में काम करें’ जैसे संदेश दीवारों पर दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविक कामकाज में अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहता है। यदि हिन्दी को वास्तव में सम्मान देना है तो केवल हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़े तक सीमित रहने से बात नहीं बनेगी। हिन्दी को व्यवहार, प्रशासन, शिक्षा और तकनीक में सहज रूप से अपनाना होगा।
यह भी समझना होगा कि अंग्रेजी का विरोध करना हिन्दी का समर्थन नहीं है। अंग्रेजी सहित सभी भाषाओं का ज्ञान उपयोगी है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब विदेशी भाषा का ज्ञान अपनी भाषा के प्रति हीनभावना का कारण बन जाए। दुनिया के अनेक देशों ने अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसलिए ज्ञान-विज्ञान को किसी एक विदेशी भाषा का पर्याय मान लेना हमारी मानसिक संकीर्णता को ही दर्शाता है।
हिन्दी को सम्मान सरकार अकेले नहीं दिला सकती। इसके लिए समाज को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। घर में हिन्दी बोलना, बच्चों को हिन्दी पढ़ाना, देवनागरी में लिखना, कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग करना और तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी की संभावनाओं को बढ़ाना—ये छोटे-छोटे कदम बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
हिन्दी को किसी दूसरी भाषा से लड़ाने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपनी भाषा को अपने ही घर में सम्मान दें। जिस भाषा में हमारी संवेदनाएँ, स्मृतियाँ, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना अभिव्यक्त होती है, उसके प्रति हीनभावना किसी भी समाज के लिए स्वस्थ संकेत नहीं हो सकती। हिन्दी का भविष्य सरकार की नीतियों से जितना जुड़ा है, उससे कहीं अधिक हमारे अपने व्यवहार और मानसिकता से जुड़ा है।
हिन्दी को बाहर से सम्मान दिलाने से पहले हमें उसे अपने घर में सम्मान देना होगा। यही हिन्दी के प्रति हमारी वास्तविक प्रतिबद्धता होगी।
डॉ. सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला
रोहतक (हरियाणा)






