जिंदगी उलझ कर रह गई है
इन तीन शब्दों के ताने और बाने में,
जो हर समय पीछा करते रहते हैं हमारा,
कब -क्यूँ और….कहाँ…?
किस -किस को जवाब देते रहें हम
क्या हमारा अस्तित्व नहीं है कोई..?
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक
कदम दर कदम
सुनने को यही मिलता है अपनों से,
कब -क्यूँ और….कहाँ…?
जीवन में कितने भी सफल हो जायें हम,
शोहरत कदमों को चूमने लगे,
फिर भी, जिंदगी आ कर अटक जाती है
उन्हीं तीन शब्दों के ताने और बाने में,
और जिंदगी खत्म भी होती है,
इन्ही तीन शब्दों के जाल में,
कब -क्यूँ और…. कहाँ…,
कब -क्यूँ और…. कहाँ…||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब
©स्वरचित मौलिक रचना
21-09-2022=23:28hr.






