ख़्वाबों की पनाहों में ग़ज़ल होती है,
किए वादों के गुनाहों में ग़ज़ल होती है।
मिटें जो मुल़्क में चैनो-अमन लाने के लिए,
उनकी हसरत भरी आहों में ग़ज़ल होती है।
निकल पड़े जो सच की राह पर सभी के लिए,
उनकी ग़ैरत भरी राहों में ग़ज़ल होती है।
ख़ुशी देकर जो सभी को ख़ुशी से झूम उठें,
उनकी पुरआब निगाहों में ग़ज़ल होती है।
वह जिन्हें इश्क़ में ख़ुदा के अक़्श जैसा दिखे,
उनकी फैलीं हुईं बाँहों में ग़ज़ल होती है।
हुक्मराँ ने किया आवाम को तबाह जहाँ,
वहाँ हर शख़्स की आहों में ग़ज़ल होती है।
उठे आवाज़ अग़र सबकी बेहतरी के लिए,
तो उसकी नेक सलाहों में ग़ज़ल होती है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।






