सतगुरु से गुरुमंत्र लिए बिन,व्यर्थ ही होता तीरथ।
गुरुवर से दीक्षा लेकर,चढ़ें धर्म यात्रा का वो रथ।।
शिक्षा-दीक्षा द्वय है जरुरी,गुरु-सतगुरु-आशीर्वाद।
गुरुदीक्षा विहीन मनवा,चले न ये जीवन निर्बाध।।
धर्म-कर्म त्याग-तप,गुरुदेव से ही मिलता है लाभ।
सतगुरु हमें बताए ये,मानव जीवन उद्देश्य साफ।।
मानव तन मिले भाग्य से,ईश्वर नाम जपो रे प्यारे।
लख चौरासी चक्कर छूटे,जाना न पड़े पुन द्वारे।।
सतगुरु दीक्षा से मुक्ति मार्ग,मिलेगा लाभ मिलेगा।
धर्म-कर्म पुण्य-प्रताप का,इंसाँ सौभाग्य मिलेगा।।
मन को सुखद शांति,आध्यात्मिक लाभ दे शिक्षा।
सदपुरुषों से मिलते हैं,ज्ञान-आनंद शिक्षा-दीक्षा।।
दुनिया की भीड़ में मत,भ्रमण करो तुम दिन-रात।
गुरु बताए जो करें वही,गुरु की मानें सदैव बात।।
शाश्वत सत्य सनातन मानें,मानव धर्म कर्म शिक्षा।
गुरु कृपा से प्राप्त करें,सार्थक जीवन की भिक्षा।।
मानव रूप धर प्रभु भी,जब धरती पर जन्म लेते।
गुरकुल गए स्वयं नारायण,गुरु शिक्षा-दीक्षा देते।।
द्वापर में संदीपन से,शिक्षा-दीक्षा श्रीकृष्णा लिए।
त्रेता में राम शिक्षा-दीक्षा,वशिष्ठ-विश्वामित्र दिए।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.






