भारत माता के वंदन में,
गीत नया गाएँ हम सब!
हिन्दी के पावन आँगन में,
दीप जलाएँ हम सब!!
तुलसी-कबीर, सूर की वाणी,
जिसमें अमृत रस घोले।
मीरा के भजनों की तानें,
प्रेम-भाव से जो बोले।
संस्कृति की यह अमर धरोहर,
जन-गण-मन को भाए।
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम,
सबको एक बनाए।
निजभाषा का मान बढ़ाकर,
शीश नवाएँ हम सब!
हिन्दी के पावन आँगन में,
दीप जलाएँ हम सब!!
शब्द-शब्द में स्नेह समाया,
भाव-भाव में पावनता।
सहज-सरल, रसधार प्रवाहित,
सिखलाए जो समता।
विज्ञान-ज्ञान की नई दिशा में,
इसका परचम फहराए।
कोटि-कोटि कंठों से गूँजे,
विश्व-मंच पर मुस्काए।
गर्वित होकर आज प्रतिज्ञा,
फिर दोहराएँ हम सब!
हिन्दी के पावन आँगन में,
दीप जलाएँ हम सब!!
हर अक्षर में ज्योति जगी हो,
हर पद में नव आशा हो।
भारत माँ के गौरव का स्वर,
अपनी हिन्दी भाषा हो।
सपनों को संकल्प बनाकर,
आगे कदम बढ़ाएँगे।
मातृभूमि के यश-वैभव को,
नभ के पार सजाएँगे।
हृदय-हृदय से जोड़ सेतु को,
एक हो जाएँ हम सब!
हिन्दी के पावन आँगन में,
दीप जलाएँ हम सब!!
दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल*
गोरखपुर उत्तर प्रदेश
🙏🙏🌹❤️






