बेटी को भी सपने देखने दो,
उसके सपनों को सच होने दो।
क्यों रोको उसके कदमों को,
क्यों बाँधो उसकी उड़ानों को।
उसके हाथों में कलम सजने दो,
उसकी आँखों में सपने पलने दो।
पढ़-लिखकर वह आगे बढ़ेगी,
अपने दम पर दुनिया से लड़ेगी।
कल तक जो बातें चुप रहती थीं,
अब वह बातें खुलकर कहेगी।
अपने हक को खुद पहचानेगी,
हर मुश्किल में राह बनाएगी।
बेटी बोझ नहीं, घर की ताकत है,
उसकी हँसी घर की आहट है।
वह पढ़ेगी तो माँ भी खुश होगी,
उसकी जीत से खुशियाँ आएँगी।
एक बेटी जब पढ़ जाती है,
पूरी पीढ़ी को राह दिखाती है।
वह डॉक्टर हो या शिक्षक बने,
अपने मन का कोई काम करे।
उसकी मंजिल वही क्यों हो,
जो समाज ने उसके लिए चुनी हो।
उसे भी अपना रास्ता चुनने दो,
उसके मन की बात सुनने दो।
बेटी को मौका देकर देखो,
उसके हौसले को परखकर देखो।
वह घर की जिम्मेदारी समझेगी,
साथ ही अपनी पहचान गढ़ेगी।
उसके पंखों को मत काटो तुम,
उसके रास्ते में मत बाँटो तुम।
आज उसे स्कूल तक पहुँचाओ,
कल वह देश को आगे ले जाएगी।
हर घर में यह बात समझाएँ,
बेटी को पढ़ाएँ, खूब पढ़ाएँ।
बेटा-बेटी एक समान रहें,
दोनों अपने सपनों में उड़ें।
जिस घर में बेटी पढ़ती है,
वहाँ उम्मीद नई-सी जगती है।
बेटी की शिक्षा सबसे बड़ा धन,
यही सँवारेगा उसका जीवन।
आज अगर हम साथ निभाएँ,
कल बेटियाँ नया सवेरा लाएँ।
जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी ‘जीत’
छत्तीसगढ़






