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निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल,

बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटे न हिय को शूल,

आज तलक मिल सका न,हिंदी को वह मान,

सदियों से जिसको चाहता पूरा हिंदुस्तान,

गुणी बन रहे लोग बहु,पढ़िके अंग्रेजी ज्ञान

पर निज भाषा के बिना, कहां है वो सम्मान,

भारत देश महान मम,गांव गली अरु द्वार

हिंदी बोली जात जहं, हैं बहुतायत परिवार,

करें सभी वंदन सदा,सबके मन की

आस

सिंहासन आरूढ़ हो,सिर आए हिंदी ताज,

शक्ति सर्जना माई के,माथे पर जो रोली

मां के आंचल की छाया में सीखी सबने हिंदी बोली

तुलसी की बनी ऊंचाई हिंदी,सूर सिंधु की गहराई

टंकार चंद वरदाई की, विद्यापति की पुरवाई,

जयकार कवी जयशंकर का, अपराजेय निराला की थाती

गर्जन है अपनी संस्कृति का, हिंदी की अपनी चतुराई,

लंबित संविधान में विषय अभी भी हिंदी की मान्य मान्यता का,

पन्नों बीच है जीवित प्रकरणआज भी इसकी मान्यता का

कभी न कभी मिलेगी मान्यता हिंदी को शीर्ष बिठाने की

हिंदुस्तान प्रतीक्षारत रत स्वयं भी, हिंदी की शुभ मान्यता का।।

 

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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