ऐसे ही मुस्कुराते रहिए
क्या पता कौन मेहरबाँ हो जाए!!
आपको पैसों से प्यार ज़्यादा है
आप से और बात क्या की जाए!!
मुकम्मल नहीं होती तुम मेरे बिना
अदावत किस बात की की जाए!!
दोस्तों से रखी है वफ़ा की उम्मीद
मगर दुश्मनों का क्या किया जाए!!
कम-‘अक़्ल सही हम तुम्हारी नज़र में
थोड़ा नज़ाकत से काम लिया जाए!!
होना है जो वह होकर रहेगा
अभी से क्यों पहरे लगाए जाएं!!
अब ना आएंगे किसी के झांसे में
चाहे दिल पर सौ इल्ज़ाम आए!!
तुम्हारा मिलना मुझसे तय है
दुनिया लाख पहरे लगाएं..!!
स्वरचित – राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान






