तुम्हें गए मुझे छोड़
ईश्वर के यहां आज
छः साल से अधिक समय हो
गया में आज भी
प्रतिदिन वहां जाते हूं
जहां हम रोज़
धूमते हुए जाते थे
बैठ कर घर और परिवार की
ख्याल और सुविधा के लिए
बात करते थे
खैर आज बैठा हूं
तुम्हारी याद खूब आ रही
क्यों नहीं जानता
सोच रहा हूं
कितनी अद्भुत नारी थीं तुम
राग देष जलन और ईर्ष्या से
कोसों दूर , जबकि यह सब तो
ईश्वर द्वारा मिले नारी के
गहने होते है और
तुम मैं कभी नहीं देखा
बस यही सब कुछ मुझे
रास आ गया था
और तुम मेरे लिए सदा
पत्नी के साथ एक आदर और सम्मान की पात्र भी रहीं
तुम्हें घर और परिवार में
अक्सर कुछ लोग कुछ
ऐसा वैसा बोलते थे
मुझे अच्छा नहीं लगता था
क्यों कि तुम को बोला
मुझे बोला होता तो
कोई फ़र्क नहीं पड़ता मुझे
पर तुम्हें भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता
अच्छा लगता यह देख
और मैं सामान्य हो जाता
सचमुच बेहद अद्भुत थी तुम
छोड़ कर जाने के बाद भी
तुम्हें मेरी चिंता और ख्याल रहा
और तुम मुझे अपनी जैसे रूह दे
गई बिल्कुल तुम्हारी तरह थीं
थी इस इसलिए लिख रहा हूं कि
वह भी छोड़ कर अपने शहर चली गई और मुझे एक और यादों का
सहारा दे गई
खैर तुम्हें तो पता होगा ही
क्यों कि यह सब कुछ
तुम्हारा ही मेरे लिए
ख्याल और चिंता है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश






