*अंक–28 : प्रकृति का कहर*
आर्यन की शादी में अब केवल पंद्रह दिन शेष थे।
घर में तैयारियाँ पूरे जोर-शोर से चल रही थीं। कभी कपड़ों की चर्चा होती, कभी मेहमानों की सूची बनती, कभी मिठाइयों का हिसाब लगाया जाता। आँगन में आने-जाने वालों की चहल-पहल बढ़ गई थी।
रामबेटी के चेहरे पर लंबे समय बाद ऐसी चमक दिखाई दे रही थी, जैसे वर्षों से बुझा कोई दीपक फिर से जल उठा हो।
दिशिका भी कभी माँ के पास बैठती, कभी भैया के पास जाकर कोई काम पूछती।
और इन सबके बीच चाची का आना-जाना भी बढ़ गया था।
उस शाम भी चाची आर्यन के घर आई थीं।
घर की स्त्रियाँ एक जगह बैठी थीं। किसी ने ढोलक संभाली तो किसी ने गीत की पहली पंक्ति छेड़ दी।
आर्यन को देखकर चाची मुस्कराईं।
“अब तो भैया की शादी में पंद्रह दिन ही बचे हैं।”
दिशिका हँसते हुए बोली,
“छोटी माँ, अब तो आपको भी खूब काम करना पड़ेगा।”
चाची ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“काम तो मैं करूँगी बिटिया, लेकिन पहले अपने भैया की बारात में खूब नाचूँगी।”
सब हँस पड़े।
कुछ देर के लिए घर में केवल हँसी थी, गीत था और आने वाली खुशियों की बातें थीं।
किसी को क्या पता था कि उसी समय दूर आसमान में बादल एक अनहोनी की कहानी लिख रहे थे।
लगातार बरसती रात
गाँव में कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी।
तालाब भर चुके थे।
खेत पानी से लबालब थे।
कच्चे रास्तों पर कीचड़ था।
पुराने मकानों की दीवारों में जगह-जगह दरारें दिखाई देने लगी थीं।
चाची का मकान भी बहुत पुराना था।
चाचा के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारियाँ चाची पर ही आ गई थीं। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और रोजमर्रा की आवश्यकताओं के बीच पुराने मकान की मरम्मत बार-बार टलती रही।
कभी पैसे की कमी सामने आती, कभी कोई दूसरा जरूरी काम।
और समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा।
उस रात बारिश कुछ ज्यादा ही तेज थी।
हवा खिड़कियों और दरवाजों से टकरा रही थी।
बादलों की गर्जना बार-बार वातावरण को हिला रही थी।
आर्यन के घर में गीतों की महफिल धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी।
चाची उठने लगीं तो रामबेटी ने कहा, “आज यहीं रुक जाइए छोटी बहन।”
चाची मुस्कराईं, “नहीं बहन, बच्चे घर पर हैं। मैं चली जाती हूँ।”
रामबेटी ने बाहर की ओर देखा।
“बारिश बहुत तेज है।”
“बस थोड़ी देर की बात है। घर पास ही तो है।”
चाची चली गईं।
दिशिका उन्हें जाते हुए देखती रही। उसे क्या पता था कि वह दृश्य उनकी अंतिम सामान्य मुलाकातों में से एक होगा।
वह भयावह आवाज
रात काफी बीत चुकी थी।
बारिश लगातार हो रही थी।
आर्यन अपने कमरे में था। रामबेटी भी सोने की तैयारी कर रही थीं।
अचानक गाँव की दिशा से तेज आवाजें सुनाई दीं,
“बचाओ…! जल्दी चलो…!”
फिर कई लोगों की घबराई हुई आवाजें एक साथ सुनाई देने लगीं।
आर्यन तुरंत बाहर आया।
“माँ, क्या हुआ?”
रामबेटी भी घबराकर बाहर आ गईं।
कुछ ही क्षण बाद एक गाँव का युवक भागता हुआ वहाँ पहुँचा।
उसकी साँसें तेज चल रही थीं।
वह बोला, “आर्यन भैया… जल्दी चलिए… चाची का मकान गिर गया है!”
एक पल के लिए सब जैसे पत्थर हो गए।
रामबेटी के मुँह से निकला, “हे भगवान!”
आर्यन ने कुछ नहीं कहा।
वह दौड़ पड़ा।
दिशिका और रामबेटी भी उसके पीछे चल पड़ीं।
मलबे में दबा एक संसार
जब वे वहाँ पहुँचे तो गाँव के लोग बड़ी संख्या में जमा हो चुके थे।
बारिश के बीच चारों ओर अफरा-तफरी थी।
जहाँ कुछ घंटे पहले चाची का घर खड़ा था, वहाँ अब केवल मलबा था।
पुरानी दीवारें भरभरा कर गिर चुकी थीं।
छत का बड़ा हिस्सा नीचे आ चुका था।
लोगों की आवाजें चारों ओर गूँज रही थीं,
“इधर से हटाओ!”
“रोशनी इधर करो!”
“सावधानी से!”
“शायद कोई नीचे हो!”
आर्यन का कलेजा काँप उठा।
“मेरे भाई-बहन अंदर हैं…!”
उसने मलबा हटाने में हाथ लगा दिया।
कई गाँव वाले उसके साथ जुट गए।
किसी ने फावड़ा लाया।
किसी ने टॉर्च।
किसी ने रस्सी।
किसी ने पुलिस और प्रशासन को सूचना दी।
बारिश के बीच राहत-बचाव का काम शुरू हो गया।
चाची की आँखें
चाची कुछ ही देर में वहाँ पहुँचीं।
अपने घर की जगह मलबे का ढेर देखकर वे कुछ क्षण तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रहीं।
फिर उनके मुँह से एक ही शब्द निकला—
“मेरे बच्चे…”
वे आगे बढ़ना चाहती थीं, लेकिन उनके कदम लड़खड़ा गए।
रामबेटी ने दौड़कर उन्हें संभाला।
चाची रामबेटी से लिपट गईं।
“बहन… मेरे बच्चे अंदर हैं… उन्हें निकाल लो…”
रामबेटी के पास कोई उत्तर नहीं था।
उन्होंने बस चाची को अपने सीने से लगा लिया।
दिशिका की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ घंटे पहले जिस चाची के साथ घर में हँसी-मजाक हो रहा था, वही चाची अब अपने बच्चों के लिए मलबे के सामने खड़ी थीं।
—
पूरी रात चलती रही तलाश
रात बीतती गई।
बारिश कभी तेज होती, कभी थोड़ी धीमी पड़ती।
लेकिन राहत-बचाव का काम बंद नहीं हुआ।
आर्यन लगातार मलबा हटाने में लगा रहा।
किसी ने उससे कहा—
“बेटा, थोड़ी देर आराम कर लो।”
आर्यन ने सिर हिलाया।
“जब तक मेरे भाई-बहन नहीं मिल जाते, मैं आराम कैसे कर सकता हूँ?”
रामबेटी दूर खड़ी उसे देख रही थीं।
उन्हें अपने बेटे पर गर्व भी था और चिंता भी।
रात के हर घंटे के साथ उम्मीद और भय दोनों बढ़ते जा रहे थे।
आखिरकार सुबह होने से पहले राहत दल को मलबे के नीचे दबे बच्चों का पता चला।
लेकिन वह क्षण खुशी लेकर नहीं आया।
एक-एक करके जब उन्हें बाहर निकाला गया, तो वातावरण में ऐसा सन्नाटा छा गया, जिसमें किसी के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं था।
चाची ने अपने बच्चों को देखा और जैसे उनकी दुनिया ही रुक गई।
उन्होंने आसमान की ओर देखा।
“हे भगवान… मुझसे मेरे बच्चे क्यों छीन लिए?”
रामबेटी की आँखें भी भर आईं।
दिशिका फूट-फूटकर रो पड़ी।
आर्यन ने अपना सिर झुका लिया।
जिस घर में कुछ दिन बाद उसकी शादी की शहनाई बजने वाली थी, उसी घर के सामने आज मातम खड़ा था।
—
शहनाई से पहले मातम
आर्यन की शादी में केवल पंद्रह दिन बाकी थे।
गाँव में जिस शादी की चर्चा हर घर में हो रही थी, उसी गाँव में अब चाची के घर का दुख हर जुबान पर था।
जिसने भी समाचार सुना, उसकी आँखें नम हो गईं।
लोग कहते—
“बेचारी चाची पहले ही पति को खो चुकी थीं… अब बच्चों का भी सहारा चला गया।”
कोई कहता—
“पुराना मकान समय पर ठीक हो जाता तो शायद यह दिन न देखना पड़ता।”
लेकिन बीता हुआ समय लौटकर कहाँ आता है?
कुछ घटनाएँ मनुष्य को जीवन भर के लिए बदल देती हैं।
यह भी वैसी ही एक रात थी।
—
“मैं भी आपका बेटा हूँ”
अगले दिन चाची बिल्कुल चुप बैठी थीं।
उनके सामने घर नहीं था।
घर की जगह मलबा था।
लेकिन असली मलबा तो उनके भीतर जमा हो चुका था।
आर्यन धीरे से उनके पास जाकर बैठ गया।
कुछ देर तक वह कुछ नहीं बोला।
फिर उसने चाची का हाथ अपने हाथ में लिया।
“छोटी माँ…”
चाची ने उसकी ओर देखा।
आर्यन की आँखें भी नम थीं।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“जब तक मैं और माँ हैं, आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है।”
चाची की आँखों से आँसू बह निकले।
आर्यन ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“मैं भी आपका ही बेटा हूँ, छोटी माँ।”
बस इतना सुनना था।
चाची आर्यन के सीने से लगकर रो पड़ीं।
रामबेटी भी अपने आँसू नहीं रोक सकीं।
उन्होंने दोनों को अपने पास खींच लिया।
तीनों देर तक रोते रहे।
दिशिका कुछ दूरी पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी।
उसके मन में भैया के लिए सम्मान और बढ़ गया।
उसने मन ही मन कहा—
“भैया केवल मेरे नहीं हैं…
वे उन सबके हैं जिन्हें इस दुनिया ने अकेला कर दिया है।”
—
खुशियों के बीच आया दुख
घर में आर्यन की शादी की तैयारियाँ अभी भी थीं।
लेकिन अब हर तैयारी के पीछे एक चुप्पी थी।
जहाँ गीत गूँजने थे, वहाँ किसी की सिसकी सुनाई देती।
जहाँ हँसी होनी थी, वहाँ चाची का सूना चेहरा दिखाई देता।
रामबेटी ने एक दिन आर्यन से कहा—
“बेटा, ऐसे समय में शादी की खुशियाँ मनाना भी मन को अच्छा नहीं लग रहा।”
आर्यन कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“माँ, जिंदगी रुकती नहीं है।”
उसने चाची की ओर देखा।
“और छोटी माँ को भी अब हमारी जरूरत है।”
रामबेटी ने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया।
“तू सच में बड़ा हो गया है बेटा।”
आर्यन मुस्कराया नहीं।
उसकी आँखें दूर कहीं देख रही थीं।
शायद वह सोच रहा था—
“जिस घर में मेरे विवाह की शहनाई बजने वाली है, वहाँ किसी माँ के घर की सारी आवाजें हमेशा के लिए खामोश हो गईं।”
—
दिशिका और बाबुल का आँगन
उस रात दिशिका देर तक सो नहीं सकी।
वह अपने बाबुल के आँगन में आकर बैठ गई।
बारिश अब थम चुकी थी।
पेड़ों की पत्तियों से पानी की बूँदें अभी भी टपक रही थीं।
तुलसी चौरे के पास दिया जल रहा था।
दिशिका ने आकाश की ओर देखा।
उसे लगा जैसे जीवन कितना अनिश्चित है।
आज कोई साथ है।
कल नहीं भी हो सकता।
आज घर भरा हुआ है।
कल वही घर सूना हो सकता है।
उसने आँगन की ओर देखा।
उसे अपनी बचपन की बातें याद आने लगीं।
बाबुल की आवाज…
माँ का दुलार…
भैया की डाँट…
चाची का स्नेह…
और वह पुरानी चिड़िया, जो रोज सुबह आँगन की मुंडेर पर आकर चहकती थी।
दिशिका की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा—
“हे भगवान… मेरे बाबुल का आँगन यूँ ही भरा रखना।”
लेकिन जीवन शायद उसके इस मासूम निवेदन का उत्तर अभी नहीं देने वाला था।
क्योंकि आने वाले दिनों में इस आँगन से भी कई परछाइयाँ विदा होने वाली थींऔर किसी को इसका आभास तक नहीं था।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
चन्दौसी जनपद संभल






