आओ शांतिमय विश्व बनाएँ

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आओ, एक दीप जलाएँ,

मन के भीतर उजास जगाएँ।

इतना उजाला हो जाए

कि कोई चेहरा भय से न झुके,

किसी माँ की आँख

अपने बच्चे के लिए न डरे।

 

क्यों बाँटें धरती को

सीमाओं की रेखाओं में?

क्यों बाँटें इंसान को

जाति, धर्म और नामों में?

 

रंग अलग हैं,

भाषाएँ अलग हैं,

संस्कृतियाँ अपनी-अपनी,

फिर भी धड़कनों का संगीत

एक ही तो है।

 

दर्द की कोई जाति नहीं,

आँसू का कोई धर्म नहीं,

और प्रेम—

किसी सीमा का मोहताज नहीं।

 

फिर क्यों

दिलों के बीच दीवारें?

 

उन्हें गिराने का समय है।

 

बच्चों के हाथों में

कलम होनी चाहिए,

किताबों में उनका भविष्य,

आँखों में आकाश।

 

जिस उम्र में

उन्हें तितलियों के पीछे दौड़ना था,

वहाँ युद्ध की परछाइयाँ क्यों?

 

जिस हाथ में

फूल खिलना था,

उसमें हथियार क्यों?

 

उन्हें विरासत में

डर नहीं, सपने दें,

बारूद नहीं,

एक सुरक्षित कल दें।

 

धरती भी चुप नहीं है।

 

कटते जंगलों की कराह,

सूखती नदियों की प्यास,

पिघलते हिमखंडों की चेतावनी

सब हमें पुकार रहे हैं।

 

हमने विकास तो बहुत किया,

पर क्या उस विकास में

धरती के लिए भी जगह बची?

 

एक वृक्ष लगाना,

एक नदी बचाना,

एक जीव को जीवन देना

 

शायद शांति की शुरुआत

यहीं से होती है।

 

क्योंकि शांति

सिर्फ युद्ध के थम जाने का नाम नहीं।

 

शांति है,

भूखे को भोजन,

डरे हुए को भरोसा,

अकेले को साथ,

और टूटे हुए मन को

जीने की वजह मिल जाना।

 

पर बदलाव की पहली दस्तक

कहाँ होगी?

 

किसी दूर देश में नहीं,

किसी बड़े मंच पर नहीं,

 

हमारे भीतर।

 

क्रोध के क्षण में

संयम चुनने से,

मतभेद के बीच

संवाद चुनने से,

और किसी गिरते हुए को

हाथ देकर उठाने से।

 

दुनिया बहुत बड़ी है,

लेकिन बदलाव हमेशा

एक छोटे कदम से शुरू होता है।

 

मैं एक कदम बढ़ाऊँ,

आप एक कदम बढ़ाएँ

शायद इसी तरह

रास्ते बनते हैं।

 

न कोई विजेता हो,

न कोई पराजित,

बस मनुष्यता बची रहे,

इतना पर्याप्त है।

 

आने वाली पीढ़ियाँ

जब हमसे पूछेंगी,

 

“तुमने हमारे लिए

क्या छोड़ा?”

 

तो हम हथियारों की सूची नहीं,

दीवारों की ऊँचाई नहीं,

युद्धों का इतिहास नहीं बताएँ।

 

हम कहें—

 

हमने तुम्हारे लिए

एक ऐसी सुबह बचाई थी,

जहाँ सूरज सबके लिए उगता है।

 

एक ऐसी धरती,

जहाँ बच्चे

डरकर नहीं,

सपने देखकर बड़े होते हैं।

 

एक ऐसा आकाश,

जहाँ उड़ान पर

किसी सीमा का पहरा नहीं।

 

और तब,

 

नारे नहीं होंगे,

घोषणाएँ नहीं होंगी,

सिर्फ मनुष्य होगा

और मनुष्य के प्रति

मनुष्य का विश्वास।

 

यही हमारी सबसे बड़ी विजय होगी।

 

आओ,

इतना-सा संकल्प करें

 

दुनिया बदलने से पहले

अपने भीतर की दुनिया बदलेंगे।

 

फिर देखना…

 

एक मन से दूसरे मन तक

प्रेम पहुँचेगा,

एक घर से दूसरे घर तक

उजाला पहुँचेगा,

और धीरे-धीरे

पूरी धरती पर

शांति का सूर्योदय होगा।

 

आओ…

ऐसी दुनिया बनाएँ,

जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियाँ कहें,

मनुष्य ने सचमुच

मनुष्य होना सीख लिया।

 

डॉ अपराजिता शर्मा

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