दिनांक: 11 सितम्बर 2026 | समय: सुबह 11:15 बजे | स्थान: नवादा
शीर्षक: [तीज पर पति-पत्नी के वार्तालाप ]
(तीज पर पति-पत्नी का वार्तालाप
पत्नी:
अजी सुनते हो, एक बात बतानी है,
तीज का त्योहार है नज़दीक,
मिलकर खरीदारी करनी है।
मुझसे मेरी पसंद की साड़ी
इस बार लेने को मत कहना,
हम दोनों को साथ चलना है,
तुम्हारी पसंद की साड़ी ही मुझे लेना है।
बस एक उलझन है मेरी,
साड़ी पहनना मुझे आता नहीं सही से,
सूट पहनना होता है आसान,
तुम ही बताओ जानेमन,
कैसे सुलझाऊँ अपनी ये उलझन?
पति मुस्कुराते हुए:
बस इतनी-सी बात पर
क्यों इतना बढ़ा-चढ़ाकर बोल रही हो?
छुरी गिरे या खरबूजे पर,
कटना तो आखिर खरबूजे को ही है!
तुम पहनो सूट या गाउन,
हर पहनावे में तुम जँचती हो,
साड़ी के चक्कर में तो
हर बार मेरा माथा पचता है!
चलो, फिर भी साल में एक बार
तुम अपनी बात से मुकरती हो,
इस बार तुम्हारी पसंद नहीं,
मेरी पसंद की साड़ी पहनती हो।
पत्नी:
लेकिन सुनो जी,
साड़ी अगर पसंद नहीं आई तो?
पति:
अरे फिर वही कहानी शुरू होगी—
“ये रंग अच्छा नहीं,
ये डिजाइन पुराना है,
वो वाली दिखाओ,
उसमें बॉर्डर ज्यादा प्यारा है!”
और आखिर में पति को कहना ही पड़ता है—
“चलो ठीक है,
जो तुम्हें पसंद है, वही ले लो!”
सच कहूँ तो जनाब,
कहाँ आसान होता है पत्नियों को
उनकी पसंद की साड़ी दिलाना!
मैंने पहले ही कहा था—
साड़ी के चक्कर में
हर बार मेरा माथा पचता है!
कवयित्री ज्योति बरनवाल,
नवादा (बिहार)
[रचनात्मक पृष्ठभूमि / मन का भाव]:
यह कविता मेरे मन में तब ख्याल आया जब मेरे पतिदेव जी ने कहा कि चलो तीज के लिए साड़ी लेनी है चलों ख़रीद देतें हैं,पर मैंने ही मना कर दी क्यूँकि पहले से ही मेरे पास है रखी हुई,कोई बात नहीं बाद में फ़िर कभी ।
फ़िर लगा मुझे अगर मैं जाती तो शायद मंज़र यही होता,
बिल्कुल यही होता 🥰






