माया की अजब है दुनिया

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कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

है दही जमीं जब आनन में।

माया की यह अजब है दुनिया,

न ध्यान लगे अब श्रीचरणन में।।

 

सुबह-सुबह जब आँख खुली तो,

दूध-दही की चिंता भारी।

मन में प्रभु का नाम तो आया,

पर याद आई घर की तैयारी।।

भूख लगी तो ध्यान बँट गया,

फँस गया फिर से बंधन में।

कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

है दही जमीं जब आनन में।।

 

माला लेकर बैठा था जब,

गिनने प्रभु के नाम मनोहर।

तभी किसी ने उसे पुकारा,

टूटा ध्यान उसी क्षण पर।।

कभी काम तो कभी जरूरत,

मन उलझा इस जीवन में।

कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

जब दही जमीं हो आनन में।।

 

धन-दौलत की चाह सताए,

शोहरत का है मोह घनेरा।

अपना-पराया करते-करते,

उसने कभी न प्रभु को टेरा।।

जिसको अपना समझ रहा है,

छूटेगा सब एक ही क्षण में।

कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

है दही जमीं जब आनन में।।

 

जब सुख आया भूल गया वह,

बस दुःख में तेरा नाम पुकारे।

मौज में वह सब भूल रहा है,

झूठ ही कहता—नाथ हमारे।।

सच्ची भक्ति वही है प्रभु जी,

नाम बसे बस धड़कन में।

कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

जब दही जमीं हो आनन में।।

 

माया के इस मोह-जाल से,

प्रभु! अब मुझको पार लगाओ।

मन-मंदिर में दीप जलाकर,

अपने चरणों में अपनाओ।

‘शिव’ की बस इतनी अभिलाषा,

नाम रहे हर स्पंदन में।

कैसे प्रभु का नाम जपे वह,

है दही जमीं जब आनन में।।

कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती, रायबरेली–२२९३०६

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