स्त्री चलती रहती है,
एक मन में कई संसार लिए।
अपनी ख्वाहिशों को छोड़,
अपने रिश्तों की खातिर जिए।
बेटी बनकर आंगन में खेलती,
बहन बनकर उठाती जिम्मेदारियां।
पत्नी बनकर घर सजाती,
मां बनकर संभालती दुनिया।
उसकी मुस्कान से खुशियां आती,
दुखों को आंचल में थाम लेती है।
कितनी भी पीड़ा हो दिल में,
वह रिश्तो को प्यारी छांव देती है।
कभी घर गृहस्थी को संभालती,
बच्चों के भविष्य को देती है आधार।
अपने रिश्तों को सुरक्षा देकर,
सब में बांटती है एक जैसा प्यार।
नारी केवल रिश्तो का नाम नहीं,
वह अपने आप में एक पहचान है।
नारी एक देह नहीं एहसास है,
मन में बसे संसारो का विश्वास है।
स्त्री मन की खामोशी को समझो,
वह गृहस्थी की तारण हार है।
एक मन में समेटे कई संसार,
करती सब रिश्तो की नैया पार है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






