हमारी प्यास का अंदाज़ भी अलग है दोस्तों,कभी समन्दर को ठुकरा देते हैं तो कभी आंसू तक़ पी जाते हैं।ज़िंदगी की इस तपिश में,तलाश हमारी बड़ी अजीब है,जहाँ समंदर की अथाह लहरें हैं,वहाँ रूह को सिर्फ़ एक बूंद नसीब है।जब चाहत का आसमान सर चढ़कर बोले,तो मौजों के उस विशाल मेले को,
हम एक ठोकर में ठुकरा देते हैं;मग़र जब तन्हाई की धूप झुलसाए,और कोई साया पास न आए,
तो अपनों की दी हुई यादों के सहारे,हम आंखों के खारे आंसू भी चुपचाप पी जातें हैं। यह प्यास भी कैसी पहेली है!जो कभी महलों की ठंडक से न बुझी,कभी बरगद और पीपल की छांव में खोई,
तो कभी हल्दीघाटी के उस लाल लहू में रोई है!
यहाँ दर्द को गले लगाना ही दस्तूर है,जहाँ हर शख़्स अपनी ही तलाश में मज़बूर है। तो दोस्तों,
समंदर को ठुकराने और आंसुओं को पीने के इस फा़सले में, बस इंसानियत की यही दास्तां छिपी है
कि कभी हम बेपरवाह समंदर से बग़ावत कर बैठते हैं,और कभी ख़ुद के ही भीतर टूटकर,
अपने ही आंसुओं से अपनी प्यास बुझा लेते हैं।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’






