हिसाब ज़िंदगी का,
खुली किताब सा,
सुलझता है यहीं।
सबको अपने कर्मों का,
फल मिलता है यहीं,
किसी दूसरी जगह नहीं।
आंँसू जो पी रहे चुपचाप,
सुनवाई उनकी भी तो,
होती है कहीं न कहीं।
दूसरों को सता कर,
सुख चाहे जो अपना,
वह जो भी हो पर,
इंसान तो नहीं।
तना हुआ वृक्ष ही ,
गिरता है टूटकर।
जो झूमता हवा संग ,
उसे कोई डर नहीं।
भले इतरा ले,अकड़ ले,
बादल अदना सा,
कैसे ढकेगा सूरज को?
झूठ बेनकाब होगा ही ,
लंबी इसकी उम्र नहीं।
गूंँज हैं कर्म,अनुगूँज बन,
लौटेंगे तुझ तक ही ,
फ़लसफ़ा यह सीधा सा,
आया क्यों समझ नहीं?
गलती तभी तो सुधारेगी ,
जब देखने-परखने की,
नीयत और नज़र हो।
आत्मा की आवाज सुन,
सच्ची और हितैषी है यह,
सद मार्ग दिखलाएगी।
साध्य तक पहुँचाएगी,
श्रेयस है यही।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली






