भाषा ही इक भाष का सोपान है।
बोलकर समझा देना सार्थक शान है।।
स्वर और व्यंजन से बने नव शब्द हैं।
शब्द ही परब्रह्म ज्योतिर्बद्ध हैं।।
मंगलों की भाषा सुख का कोष है।
अमंगल से भरा बस राक्षसी कोष है।।
हाँ हिन्द की भाषा हमारी जान है।
देवनागरी लिपि मेरी पहचान है।।
भू भाग की विस्तारता हम मान लें ।
और सात हजार एक सत्रह जान लें।
कैसे हम अपने को कम आंक लें ।
चिर सनातन संस्कृति शब्द कोई टांक ले।।
कितनी सरल कितनी सुगम यह हिन्दी है।
जो कि मन्दिरों की पूजनीय पिंडी है।।
स्वरचित : डाॅ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद , उ.प्र ।






