मात-पिता न मिलें दुबारा जीवन में

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माँ पर सृजित रचना-क्रमशः शेष भाग..(2)प्रेषित

उसके पीछे बच्चों का अहित,नहीं हित छुपा होता।

मात-पितु को दुःख होता,जब उसका बच्चा रोता।।

 

बच्चों का व्यवहार कभी,माता-पिता को हैं रुलाते।

आँसू आँखों में भर भर आए,वृद्धों को वो रुलाते।।

 

फिरभी केवल मात-पिता हैं,जो कभी श्राप न देते।

हर दुःख सह लेते हैं पर,बच्चों को श्राप नहीं देते।।

 

क्षणित कुपित भले हो जाते,पर बच्चों से प्रेम करें।

बच्चे से बढ़ नाती नातिन,पोती पोता से प्रेम करें।।

 

धन दौलत जागीर बनाए,जो सब उनको दे देते हैं।

मात-पिता सबकुछ अपना,लुटा उन्हीं पर देते हैं।।

 

खाली हाथ लिए जीते हैं,पर देते सदैव आशीर्वाद।

बच्चों हेतु जिएं माँ-बाप,इनके संसार हों आबाद।।

 

बेटे-बहू के घर में अब,बूढ़े-बूढ़ी की वो जगह नहीं।

पाला-पोशा उनने सबको,उसकी कोई कदर नहीं।।

 

वृद्धा आश्रम में रहने को,कितने?जोड़ें हों मजबूर।

आज कल के बेटे-बहू हो,रहे इसके लिए मशहूर।।

 

जाने कैसे ?संस्कार लेकर,आएँ नई नवेली दूल्हनें।

दूल्हे भी कुछ दिन में वैसे,होने जैसी चाहें दूल्हनें।।

 

किसी अकेले की बात नहीं,यह दुनिया का दस्तूर।

शायद उनके बच्चे भी सीखें,उनसे तो यही सहूर।।

 

बच्चों का दोष नहीं इसमें,ये कलयुग का असर है।

अपने ही घर में अपनों का,इतना बढ़ता कहर है।।

 

दम घुटता है ऐसे में अब,तो देख दुनिया का हाल।

कैसे?हो गए बच्चे देखो,घर परिवार में बुरा हाल।।

 

पिछली रचना (1) का क्रमशः………शेष भाग है।

 

सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

 

रचयिता :

*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.

(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)

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