ले चलो मुझे उस ओर जहाँ, भूले कवियों की भाषा हो!
बिखरे मकरंदों में छिपी हुई, कुछ आशा, कुछ अभिलाषा हो!
चादर में लिपटे मूर्तिरूप, चिन्तन-अगाध में ध्यान मग्न
साहित्यों के ऋषि मुनियों की, मन्त्रों सी अंतरभाषा हो!
हों मन्त्र-बद्ध सुनने वाले, आँखें मूँदें उनके सुर में
जन जन के मन में डूबी, मानव-जीवन परिभाषा हो!
छाया गीतों से टप टप कर, बरसे बूँदों की मधु-फुहार
कुछ प्रेम गीत, कुछ ओज भरे, कुछ गीतों में दुर्वासा हो!
‘बच्चन’ की ‘मधुशाला’ में, नाचें ‘प्रसाद’ की ‘श्रद्धायें’
हिन्दी के हों रस, अलंकार और उर्दू की रक्कासा हो!
बूढ़ी आँखों में छिपी हुई, चमकें उम्मीदों की किरणें,
जो बाट जोहते ‘बेटों’ की, उनको थोड़ी सी आशा हो
संसृति में गूँज उठे फ़िर से, अपनी माताओं की भाषा,
भारत-भाषा के प्राण जागें, अपनेपन की जिज्ञासा हो!
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।






