प्रणय और तप की पावन गाथा
पार्वती ने शिव-प्राप्ति हेतु, साधा था दुर्धर तप,
त्याग दिया राजसी वैभव, अडिग रहा अनुरागी मन।
सखियाँ हर ले गईं गौरी को, इसलिए ‘हरतालिका’ नाम,
शिव को वर रूप में पाने का, बना अमर वह पुण्य-प्रणाम।
सुहागिनें रखतीं यह व्रत, अखंड सौभाग्य की आस लिए,
पति के दीर्घायु जीवन का, मंगलमय विश्वास लिए।
निर्जल रहकर संयम साधें, तन से अधिक मन तपता है,
वाणी में मधुरता, हृदय में श्रद्धा—यही व्रत का सत्य कहता है।
न क्रोध, न कटुता, न छल हो, अंतर्मन निर्मल रखना है,
शिव-पार्वती के पावन युग्म-सा, दाम्पत्य प्रेम सँजोना है।
मृत्तिका से गौरी-शंकर की, प्रतिमा रचकर पूजन होता,
षोडशोपचार, कथा-जागरण से, मंगल-दीप हृदय में जलता।
मेहंदी, सोलह श्रृंगार नहीं केवल बाह्य अलंकरण है,
निष्ठा, त्याग, समर्पण ही तो, सुहाग का वास्तविक आभरण है।
हरतालिका का यह व्रत कहता—प्रेम तपस्या से खिलता है,
जहाँ विश्वास अखंड रहे, वहीं दाम्पत्य शिवत्व मिलता है।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






