तीज पर पति-पत्नी का वार्तालाप

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पत्नी:

अजी सुनते हो, एक बात बतानी है,

तीज का त्योहार है नज़दीक,

मिलकर खरीदारी करनी है।

 

मुझसे मेरी पसंद की साड़ी

इस बार लेने को मत कहना,

हम दोनों को साथ चलना है,

तुम्हारी पसंद की साड़ी ही मुझे लेना है।

 

बस एक उलझन है मेरी,

साड़ी पहनना मुझे आता नहीं सही से,

सूट पहनना होता है आसान,

तुम ही बताओ जानेमन,

कैसे सुलझाऊँ अपनी ये उलझन?

 

पति मुस्कुराते हुए:

बस इतनी-सी बात पर

क्यों इतना बढ़ा-चढ़ाकर बोल रही हो?

छुरी गिरे या खरबूजे पर,

कटना तो आखिर खरबूजे को ही है!

 

तुम पहनो सूट या गाउन,

हर पहनावे में तुम जँचती हो,

साड़ी के चक्कर में तो

हर बार मेरा माथा पचता है!

 

चलो, फिर भी साल में एक बार

तुम अपनी बात से मुकरती हो,

इस बार तुम्हारी पसंद नहीं,

मेरी पसंद की साड़ी पहनती हो।

 

पत्नी:

लेकिन सुनो जी,

साड़ी अगर पसंद नहीं आई तो?

 

पति:

अरे फिर वही कहानी शुरू होगी—

“ये रंग अच्छा नहीं,

ये डिजाइन पुराना है,

वो वाली दिखाओ,

उसमें बॉर्डर ज्यादा प्यारा है!”

 

और आखिर में पति को कहना ही पड़ता है—

“चलो ठीक है,

जो तुम्हें पसंद है, वही ले लो!”

 

सच कहूँ तो जनाब,

कहाँ आसान होता है पत्नियों को

उनकी पसंद की साड़ी दिलाना!

 

मैंने पहले ही कहा था—

साड़ी के चक्कर में

हर बार मेरा माथा पचता है!

 

कवयित्री ज्योति बरनवाल,

नवादा (बिहार)

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