क्या है कविता

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कविता, कवि की है आत्मजा!

या सूर्य-रश्मि की सविता है,

गंगोत्री के पावन कण जैसी

शब्दों की बहती सरिता है!

‘कविता’ में ‘क’ की कोमलता

‘वि’ से विचार, धारा-प्रवाह,

‘ता’ से तापस, तादात्म्य-बोध

दिखलाती कवि के मन की चाह!

कात्यायन की कात्यायनी है

रस, अलंकार से सजी हुई,

जब कोमल मन से निकलती

तब “कंकन किकिन” सी बजी हई।

वर्णों की माला पहनाकर

शब्दों की महिमा बुनती है,

कहीं कृष्णवर्ण, कहीं गौरवर्ण,

कहीं पीतवर्ण से गुनती है।

कविता, कवि की मुँहबोली

आती, रस का श्रृंगार किए

कभी रौद्र, हास्य और करुण

कभी आँखों में अंगार लिए!

कविता, माँ की है वत्सलता

कभी राग और विराग लिए

कविता, प्रेयसि का संयोग राग,कभी अंतर में वियोग लिए।

कविता कवि का व्यक्तित्व रूप,

मन-चिन्तन की प्रतिछाया है!

कवि दिखे या नहीं दिखे,

कविता ही उसकी काया है!

महादेव की जटाओं से विस्तृत,गहन विचार करते हैं विस्मित! बिन अभिव्यक्ति

हो मन व्यथित,

तब बन के गंगा ये हो अवतरित

कृति रचना को देती सम्मान

करती अक्षरों को प्राण प्रदान

भाव-रस परिपूर्णित अश्रुधारा

उद्द्रमित अविरल काव्यधारा

आकुल हृदय की व्याकुल सरिता,निर्झर निर्मल वेगित कविता!

रचती नहीं मैं कविता मां,

रच जाती है!

भाव-गंगा सी मेरे मन में उमड़ आती है!

तेरा वरद-हस्त ही तो है मेरे शीश पर माँ!

काव्य पंक्तियों से तेरी आरती उतर जाती है!

 

-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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