अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस

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धरती के माथे से अब, युद्ध-धुआँ हटाएँ,

नफरत की सूखी धरती पर, प्रेम-फूल खिलाएँ।

 

सीमाओं की काँटों वाली, दीवारें कुछ ढहें,

मन से मन की दूरियाँ मिटें, हाथों में हाथ रहें।

 

बारूदों की गंध न हो, गूँजे मधुर तराने,

बच्चों की आँखों में बसें, सपनों के अफसाने।

 

मजहब, भाषा, रंग भले हों, मानवता एक रहे,

हर आँगन में दीप जले और, हर चेहरा नेक रहे।

 

क्रोध नदी जब उफन पड़े तो, धैर्य बने किनारा,

कटु शब्दों के तीर न चलें, हो संवाद हमारा।

 

जहाँ विवेक का सूरज निकले, मिटे अँधेरा सारा,

करुणा की शीतल छाँव बने, जग का एक सहारा।

 

पेड़ों की पत्तियों पर जैसे, ओस शांति से ठहरे,

वैसे ही हर हृदय में, विश्वास के दीपक गहरे।

 

धरती माँ के आँचल पर फिर, रक्त-चिह्न न आएँ,

शांति-सुगंध लिए मानवता, नभ तक पंख फैलाएँ।

 

आज प्रण लें—घृणा नहीं, हम प्रेम-दीप जलाएँ,

विश्व-शांति के पथ पर मिलकर, मानव धर्म निभाएँ।

 

स्वरचित

डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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