कलयुग के माता पिता
आज दिन को खाना खाने के बाद, सोचा कुछ दूर धुम आते है,बस चल दिया अपने देव स्थल पर, धूप तेज थीं मुझे इन सब से ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता हैं खैर आते समय एक कार पीछे से आता हुई मेरे आगे निकल कर कुछ दूर रुकी एक किशोर खूब सूरत मासूम उतर कर सीधा तेज गति से सड़क के किनारे जाता है और उल्टी करता हूं वह धनराया हुआ था स्वाभाविक है तब तक मैं कार के समीप चला जाता हूं और एक नज़र कार में बैठे बड़े लोगों पर डालता हूं, कार वाले बहुत बड़े लोग होती हैं साहब बहुत अनुभव है कार तो हमारे पास भी है सालो से और बहुत महंगी भी पर हम सालों में दो बार बैठे एक बार थे पटनी के साथ दूसरी बार हमारी रूह के साथ फिर कभी मन नहीं हुआ
खैर साहब कार में देखा उस किशोर के पिता गाड़ी चला रहे थे
पास उनकी खूब सूरत पत्नी उनके लिए मेरे लिए नहीं आजकल सभी पत्नी खाते पीते बड़े लोगों के घी सी दिखाई देती हैं बहुत मुश्किल से सैकड़ों में कोई दो चार मेरा तरह दुबली पतली दिखाई देती हैं खैर साहब
आज की पत्नी है चेहरा पर दिखाई दे रहा बेशुमार अहम समेटे हम फकीर को देख और तनाव आँखो में, पिता गाड़ी चला रहे थे पुत्र को इस हालत में देख कुछ चिंता समेटे सिर में बालों को हाथ से धूमा रहे थे जैसे क्या करूं
पीछे पिता की मां अर्थात किशोर की दादी थीं जिसके पास वह बैठा था
हमारे समय यह दृश्य ऐसा होता
मां हमारे पास आगे गाड़ी में दस्तक देती पत्नी बेटे के साथ पीछे यह सदा होना चाहिए पर कलयुग में ऐसी बातें बेवकूफ लोग करते हैं मेरी जैसे चंद लोग
दादी थीं दादा नहीं थे दुनिया में साफ़ दिखाई दे रहा था दादी के चेहरे से वैसे भी हम पता नहीं क्यों सब कुछ जान जाते है राम जाने यह सब कुछ
किशोर गाड़ी में बैठा गाड़ी फिर तेज़ गति से चल दी बस मन नहीं लगा पुरे रास्ते में घर आकार भी ईश्वर से प्रार्थना करता रहा है ईश्वर उसे जल्दी ठीक कर देना बदले में मेरा कोई सुख तुझे दिल से भेंट करता हूं ले लेना पर उसे ठीक करना है न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता हैं वह मेरी सुनता है इस लिए उसे कह देता हूं वैसे भी साहब सत्य है यह दूसरे के लिए की नई दुआएं जल्दी ईश्वर सुनता है
उस किशोर को ले चिंतित था वहीं गाडी में बैठे माता पिता का कई दृष्टि से गलत दिखाई दिया लगा कितने संवेदना सुनी है कितने,,,,
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश






