सार्द्ध – सरस छंद
नर के बिना है नारी अधूरी सदा,
कह कर मुझे लाचार ऐसा कर दिया ।
नर भी नहीं पूरा कभी भार्या बिना,
मैं थी शक्ति रूपा सुकोमल मन किया ।
पहले मुझे आकाश से बंचित किया,
आगे बढ़े उत्साह को बाधित किया ।
हर बात में पीछे रखा आहत रही ,
ऐसे सिला कमज़ोर होने का दिया ।
मैं तो नहीं रुकती किसी भी हाल में,
मुझको लिया था बाँध माया जाल में ।
ममता बनी बाधा पिया का मोह भी,
अब फँस चुकी हूँ मैं तुम्हारी चाल में ।
सरोज शर्मा
दिल्ली






