विविध

नवगीत

मशीनों के जंगल में मुखड़ा कल की नस में आज बहे, मन का अपना रक्त रहे, मशीनों के जंगल में भी मन का एक वृक्ष रहे।   नीली-नीली स्क्रीनें हों, खिड़की पर...

कैसे धरम निभाऊँ अपना

कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला। मन चाहे प्रभु-पद लेकिन, चढ़ा हुआ है मोह का जाला।।   भोर भये तो काम बुलावै, साँझ पड़े खूब...

गुरु वशिष्ठ गुरुकुल

*गुरु वशिष्ठ गुरुकुल, चुनार (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) - एक विस्तृत लेख*   *लेखक - आचार्य धीरज याज्ञिक के अवलोकन में, प्रेरणा - महर्षि वशिष्ठ*   *प्रस्तावना - प्राचीन...

खिड़की के पार

खिड़की के उस पार..., कुछ यादें धुंधली सी ठहरी हैं, जैसे -तेरे आँखों की नमी, जो अब भी हवाओं में बिखरी हुई है, खिड़की पर जब भी बारिश...

सपने आँखों में हमारे जो बताएंँ कैसे।

बेड़ियाँ रोक रहीं पांँव हैं जाएंँ कैसे।   पंख फैलाके भी जो उड़ न सका हो पंछी हम वही हैं मगर ये बात जताएँ कैसे।.   कहती हूँ पांँव...

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