दूरियांँ क्यों बढ़ा रहे हो हमसे
फ़ासिले इस तरह से कम नहीं होंगे!!
बोल कड़वे रखोगे तो कौन मानेगा
महफ़िल में कौन हम जुबाँ होंगे!!
अभी तो ख़ैर कुछ हुआ ही नहीं
हमारे भी जीने के अवसर होंगे!!
दिल लगा कर बैठ गए हो शायद
क्या लगता है फिर कभी जन्म होंगे!!
दुश्मनी दुनिया भर की करते हो
प्यार से भी अब तिजारत होंगे!!
गुमनाम जी रहा हूंँ तुम्हारी ख़ातिर
वर्ना जीने को और विकल्प होंगे!!
तुम्हारा ख़ुद पर ही इख़्तियार नहीं
हाँ दोष दूसरे के जरूर होंगे!!
अपनी परछाई से इतना डरते क्यों हो
सितम कब तक तुम्हारे कम होंगे!!
चलोगे कब तक इशारे पर रक़ीब
यह ना हो कि वहांँ पर भी बेवफ़ा होंगे!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान






