माता का दरबार

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मातु तुम्हारे दर्शन को सब ,भक्त दूर से आते हैं।

मनोकामना पूरी हो माँ ,तुम से आस लगाते हैं।।

आई मैं भी शरण तुम्हारी ,मुझे पिला देना हाला।

खो जाऊँ चरणों में तेरे ,भूल सभी कंठी-माला।।

 

जगदम्बे तेरी महिमा का ,कोई पार न पाता है।

दीन-दुखी के जीवन में तू ,सुख-सुमन खिलाता है।।

तेरे द्वारे जो भी आया ,भरकर झोली जाता है।

अंधियारे मन के कोनों में ,दीप स्वयं जलाता है।।

 

भक्तजन हृदय में नाम तेरा ,सदा सुमिरन करता है।

भक्ति-भाव की गागर भरकर ,तेरा अर्पण करता है।।

कृपा दृष्टि जब हो जाए तो ,भाग्य स्वयं मुस्काता है।

माता के दरबार में आकर ,जीवन धन्य हो जाता है।।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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