एक अजीब विडंबना है। आजकल साहित्यिक पत्रिकाएँ मात्र 100 से 200 रुपये तक में मिल जाती हैं, यानी एक पिज्जा या दो-तीन सिगरेट के पैकेट के बराबर। इतना पैसा हमलोग रोज़ पान, सिगरेट, चाय, श्रृंगार या फैशन में बिना सोचे खर्च कर देते हैं। लेकिन जैसे ही 170 – 180 रुपये की प्रिंटेड पत्रिका खरीदने की बात आती है, हम कहते हैं – “PDF भेज दीजिए।”
समस्या कीमत की नहीं, मानसिकता की है। सबको साहित्यकार बनना है, सबको अपनी रचना छपी हुई देखनी है, पर कोई भी उस छपे हुए शब्द का मूल्य चुकाने को तैयार नहीं है। और जब तक हम मूल्य नहीं चुकाएंगे, साहित्य मूल्यहीन हो जाएगा।
अगर इन्द्रधनुष चाहिए तो बारिश तो झेलनी ही पड़ेगी।
एक तरफ एक लेखक साहित्यकार बनने के लिए आतुर हैं, ह्वाट्सएप/ फेसबुक पर कविता पोस्ट करते ही उसे ‘पत्रिका में छपा’ देखना चाहता है। दूसरी तरफ वही पाठक-लेखक 100-200 रुपये की प्रिंटेड पत्रिका खरीदने में हिचकता है। तर्क देता
है – “PDF में मिल ही जाती है, प्रिंट कौन खरीदे।”
यह वही पाठक है जो रोज 20 रुपये की सिगरेट, 30 रुपये का पान-गुटखा, 50 रुपये की चाय या 500 रुपये का फेसवॉश बिना सोचे खरीद लेता है। सवाल पैसे का नहीं, प्राथमिकता और आदत का है। हम साहित्य को मुफ्त में पाना चाहते हैं, पर साहित्य मुफ्त में बनता नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में प्रिंटेड पत्रिका के फायदों को समझना जरूरी है। प्रिंट पत्रिका के फायदे केवल भावुक नहीं, पूरी तरह तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण हैं।
*1. प्रिंट पढ़ना, आँखों और मस्तिष्क के लिए पढ़ना है*
प्रिंटेड पत्रिका में आप रुकते हैं। कागज की गंध, पन्ने पलटने की आवाज़, मार्जिन पर पेन से निशान लगाना – यह शारीरिक क्रिया आपके मस्तिष्क को गहरे ध्यान (Deep Reading) में ले जाती है। अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार स्क्रीन पर पढ़ने से ‘डिजिटल आई स्ट्रेन’ 70% तक बढ़ जाता है। मोबाइल पर PDF पढ़ते समय हमारी आँखें 60% कम झपकती हैं, जिससे जलन और थकान होती है।
वहीं प्रिंटेड कागज आँखों के लिए सबसे प्राकृतिक माध्यम है। उसमें नीली रोशनी नहीं होती।
दूसरा तथ्य – प्रिंट पर हमारा ध्यान 30% अधिक केंद्रित रहता है। मोबाइल पर PDF खोलते ही 5 मिनट में व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम का नोटिफिकेशन आता है और हम कविता/ कहानी के बीच से ही भटक जाते हैं। प्रिंटेड पत्रिका आपको भटकने नहीं देती, वह आपको पकड़ कर रखती है। साहित्य को एकाग्रता चाहिए, स्क्रॉल नहीं।
*2. प्रिंटेड पत्रिका एक ‘अनुभव’ है, फाइल नहीं*
PDF एक फाइल है, प्रिंट एक अनुभव है। कागज की खुशबू, पन्ने पलटने की आवाज, किसी अच्छी पंक्ति को अंडरलाइन करना, हाशिये पर कुछ लिख देना – यह सब पाठक और लेखक के बीच एक आत्मीय संबंध बनाता है।
*3. प्रिंट ही साहित्य को संग्रहणीय बनाता है*
आपने कभी किसी PDF को अपने मित्र को गर्व से दिखाया है? नहीं। पर एक अच्छी पत्रिका जिसमें आपकी रचना छपी हो, आप उसे सालों तक अपनी अलमारी में सजाते हैं, अपने बच्चों को, दोस्तों को दिखाते हैं। प्रिंट ही साहित्य को संग्रहणीय बनाता है। आज से 20 साल बाद आपका मोबाइल बदल जाएगा, PDF डिलीट हो जाएगी, पर वह 2026 की पीली पड़ चुकी पत्रिका तब भी आपकी अलमारी में जीवित रहेगी।
*4. मुफ्त PDF साहित्य का पूरा इकोसिस्टम मार रहा है*
एक प्रिंट पत्रिका के पीछे केवल एक संपादक नहीं होता। लेखक, कवि, प्रूफ रीडर, डिजाइनर, बाइंडर, डाकिया और बुकसेलर – एक पूरी श्रृंखला होती है। जब आप 170 – 180 रुपये देते हैं, तो आप केवल कागज नहीं खरीदते, आप इस पूरी साहित्यिक अर्थव्यवस्था को जीवित रखते हैं।
जब हम संपादक से कहते हैं – “PDF भेज दो”, तो हम अनजाने में पायरेसी को बढ़ावा देते हैं। एक PDF 500 लोगों में फॉरवर्ड हो जाती है। प्रकाशक को एक प्रति का भी पैसा नहीं मिलता। नतीजा – अच्छी पत्रिकाएँ बंद हो रही हैं। पिछले 5 वर्षों में हिंदी की कई प्रतिष्ठित प्रिंट पत्रिकाएँ केवल इसलिए बंद हुईं क्योंकि पाठक पढ़ना चाहते थे, लेकिन खरीदना नहीं।
मैं अपना अनुभव साझा कर रहा हूँ। *संचेतना के स्वर* को छपवाने में मुझे हर बार 50 प्रति के लिए 100×50 = रु.5000 लगता है ( 50 प्रति से कम कोई प्रकाशक नहीं छापता), जिसके सापेक्ष मात्र 17 18 20 लोग ही पुस्तक लेते हैं जो कि लेखक ही होते हैं। इस प्रकार मुझे मात्र रु.100 x 20 = रु. 2000 मिलता है (रु.100 पुस्तक की लागत + 70 डाक खर्च हम लेते है)। शेष 3000 रुपया मुझे हर बार अपने पॉकेट से लगाना पड़ता है। मेरे ह्वाट्सएप और फेसबुक ग्रुप में औसतन 400 सदस्य हैं तथा हर बार 60 से 70 लेखक इस पत्रिका में अपनी रचना भेजते हैं। यदि पत्रिका में जितने लेखक है वे सब भी मुद्रण शुल्क का भुगतान करें तो मुझे हर बार अपने पॉकेट से भुगतान नहीं करना पड़ेगा।
*5. जो खरीद कर नहीं पढ़ता, वह लिख भी नहीं सकता*
यह सबसे कड़वा सच है। साहित्यकार बनने की पहली शर्त है – साहित्य का पाठक बनना। और पाठक वही है जो साहित्य का सम्मान करता है।
जो व्यक्ति 170 – 180 रुपये की पत्रिका को महंगा समझता है, वह अपनी ही रचना का अपमान कर रहा है। क्योंकि कल जब उसकी किताब छपेगी, तब भी कोई दूसरा उसे यही कहेगा – “PDF भेज दो।” सम्मान एक चक्र है। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपकी रचना को महत्व दें, तो आपको पहले दूसरों की रचनाओं को महत्व देना होगा।
*निष्कर्ष:*
सिगरेट का धुआँ 5 मिनट में हवा में उड़ जाता है, पान का स्वाद 10 मिनट में खत्म हो जाता है। शृंगार, फैशन कुछ ही देर में मिट जाते हैं, पर एक अच्छी पत्रिका का एक लेख एक कविता आपके भीतर वर्षों तक जीवित रहती है।
*अंत में -*
साहित्यकार बनना है तो पहले सच्चा पाठक बनना पड़ेगा। और सच्चा पाठक वह है जो साहित्य के लिए जेब से नहीं, दिल से खर्च करता है।
रोज 100 रुपये साज-शृंगार पर खर्च करने वाला चेहरा एक दिन मुरझा जाता है, पर 100 रुपये की पत्रिका से बना मन जीवन भर महकता है।
इसलिए अगली बार जब PDF फ्री में मिले, तो खुद से पूछिए – क्या मैं अपने शौक के लिए, अपनी आवश्यकता के लिए भी इतनी ही कंजूसी करता हूँ? यदि नहीं, तो साहित्य के लिए क्यों?
इसलिए अगली बार जब आप कहें कि “PDF ही भेज दीजिए”, तो खुद से एक सवाल पूछिए – क्या मैं साहित्य को उपभोग की वस्तु समझ रहा हूँ या साधना की?
100-200 रुपये कोई कीमत नहीं है। यह साहित्य के प्रति आपका छोटा सा प्रणाम है। और याद रखिए, जो समाज अपने शब्दों का मूल्य नहीं चुकाता, उसका शब्द एक दिन मौन हो जाता है।
-डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
संस्थापक व अध्यक्ष । संपादक । कवि । छंद विशेषज्ञ । स्तंभकार।
एच-1, विनायक सुख विला, लूकरगंज,
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश 211001
संपर्क-सूत्र (फोन): 9452252582, 8318980710
ईमेल : arjun_shaw2002@yahoo.co.in






