संस्कृत की अमर कोख से जन्मी,
प्राकृत-अपभ्रंश से निखरी।
कबीर-सूर-तुलसी की वाणी,
रसखान-मीरा में जो बिखरी।
शौर्य, प्रेम और भक्ति रस में,
हर युग में जो पावन घूमी,
यह जन-जन के मन की धड़कन,
माटी का गौरव, यह हिंदी!
आज़ादी की बनी मशालें,
दिनकर, गुप्त का ओज जगाया।
बिखरे भारत के अंतर को,
एक सूत्र में इसने पिरोया।
राजमहलों की दासी नहीं यह,
चौपालों का स्वर है न्यारी,
युगों-युगों की चेतना यह,
संस्कृति की रक्षक बलिहारी!
किंतु आज तकनीक के रण में,
डिजिटल युग की नई डगर है।
अंग्रेज़ी के इस सागर में,
हिंदी भी अब विश्व-शिखर है।
कागज़ से स्क्रीन तक पहुँची,
की-बोर्ड पर उँगलियाँ नाचीं,
एआई और नवाचार में भी,
अपनी पहचान अडिग सांची!
विश्व पटल पर गूँज रही अब,
यह केवल अतीत का गान नहीं।
भविष्य की यह अमर चेतना,
इसका कोई सानी नहीं।
सीखो जग की हर भाषा तुम,
पर निज भाषा का मान धरो,
माटी की इस पावन धुन पर,
भारत का उत्थान करो!
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






