मैं मिट्टी हूॅं।
सृष्टि के प्रारंभ से थी।
सृष्टि के अंत तक रहूॅंगी।
साक्षी हूॅं मैं युगों-युगों से,
सृष्टि के उत्थान- पतन की।
निर्माण और विनाश की।
पतझर और मधुमास की।
रूदन और हास्य की।
तांडव और लास्य की।
मैं मिट्टी हूॅं।
अनेक विरोधों का सौंदर्य
समाए हूॅं अपनी काया में।
मिट्टी हूॅं पर मिटी नहीं।
तुच्छ हूॅं,पर अनमोल
मुझ सा कुछ भी नहीं।
मैं जड़ हूॅं,मगर चेतन
जीवन उपजाती हूॅं।
गर्भ में बीज को धारती हूॅं,
अंकुर को उगाती हूॅं।
गोद में अखिल जग को
पोसती हूॅं,दुलराती हूॅं।
नदियाॅं बहा ,वक्ष पर अपने।
वात्सल्य -सलिल बहाती हूॅं।
खलिहानों में शस्य बन,
इठलाती, मुस्कराती हूॅं।
मैं मिट्टी हूॅं।
कान्हा तेरा मुझ पर ही,
धुटुरुनि चला है।
उसका अनगढ़ खिलौना भी,
मैंने ही घड़ा है।
तेरे ईश्वर की मूरत भी
मैंने ही गढ़ी है।
दिया बन आरती भी
मैंने करी है।
प्रकृति संपदा सारी,
मेरे दम पर खड़ी है।
मैं मिट्टी हूॅं।
मैं संस्कृति- प्रगति की
पहचान हूॅं।
मानव गौरव -गाथा का
जयगान हूॅं।
मैं जीवनदायिनी हूॅं।
संजीवनी हूॅं,प्राण हूॅं।
मेरी रक्षा ,रक्षा है तेरी।
यही मात्र परित्राण है।
नदियों को ,स्वच्छ बहने दे।
जंगलों पर मत चला कुठार।
पेड़ों का उपहार दे मुझे,
पर्वत पर मत कर प्रहार।
मत कर बंजर मुझे,
आने दे मुझ पर बहार।
तभी उऋण होगा,
तू ऋण से मेरे।
होंगे समस्त सपन साकार।
मैं माटी ,कृतज्ञ बनूॅंगी तब तेरी।
लुटा दूॅंगी तुझ पर दुलार।
मैं मृतिका हूॅं जननी तेरी,
विधाता का अनुपम उपहार।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली






