दिव्य देववाणी की दुहिता,मधुरिम पावन बोल।
उपभाषाओं की जो जननी, हिंदी हैअनमोल।।
तत्सम शब्दों का भरा खजाना,अलंकार की खान।
छंदों की भरमार बहुत है,वीणा की मृदु तान।।
सभी तार झंकृत कर देती, हिंदी बड़ी महान।
त्याग-शौर्य की अनुपम गाथा, वीरों का अभिमान।।
जन-जन को अति करें प्रभावित, देती मिश्री घोल।
उपभाषाओं की है जननी, हिंदी है अनमोल।।
कर्मशील है बनी निरंतर,दूरदर्शिता ध्येय।
हिमगिरि के मस्तक पर सजती, बिंदी का है श्रेय।।
भावों का है सार समाहित, करना इस पर शोध।
अनुनासिका अनुस्वार का जो,सदा कराती बोध।।
अन्य देश की जो भाषाएँ, उससे कभी न तोल।
उपभाषाओं की जो जननी, हिंदी है अनमोल।।
मिले राष्ट्रभाषा का दर्जा, संविधान में मान।
सकल विश्व में गूंँज उठा है,हिंदी का जयगान।।
हिंदी की बिंदी उपयोगी, इसका रखना ध्यान।
अर्थ अनर्थ सदा हो जाता, हरदम लें संज्ञान।।
पूर्ण रूप से प्रचलन में हो, पृष्ठ सभी दें खोल।
उपभाषाओं की जो जननी, हिंद है अनमोल।।
तुलसी सूर कबीर जायसी, महादेवि रसखान।
दास नरोत्तम विद्यापति ने, पाई थी पहचान।।
पंत प्रसाद निराला दिनकर, भारतेंदु की आन।
सबने मिलकर विस्तार दिया, हिंदी सबकी शान।।
भाषाई श्रृंगार बढा़कर,बदल दिए भूगोल।
उप भाषाओं की जो जननी, हिंदी है अनमोल।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश
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