जिन्होंने अपना जीवन दे डाला

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जिन्होंने अपना जीवन दे डाला

उनको जीवन भर सम्मान मिले।

 

वरिष्ठ जन दिवस पर विशेष भावांजलि

 

घर के कोने में बैठे हैं,

आँखों में कुछ प्रश्न लिए।

कब आओगे पास हमारे,

मन में ऐसे शब्द लिए।

 

कल तक जिनके स्नेह से ही,

घर में रहती थी मुस्कान।

आज उन्हीं के सूने मन में,

क्यों पसरा है यह सुनसान?

 

जिन हाथों ने नींव रखी थी,

अपने सुंदर आशियाने की,

जिन्होंने अपना सुख त्यागा,

देखने मुस्कान संतानों की।

 

खुद तपते रहे धूप में लेकिन,

हमको देते रहे सुकून।

आज उन्हीं के जीवन में क्यों,

छाया रहता है मौन?

्

बचपन में जब गिरते थे हम,

दौड़ लगाकर आते थे।

आँचल में भरकर हमको,

आँसू सारे पोंछ जाते थे।

 

आज वही जब बैठे थक कर,

किससे अपना दर्द कहें?

पास खड़े हैं अपने सारे,

किसके फिर साथ रहें?

 

धीमी होती उनकी साँसें,

बीते दिन दोहराती हैं।

चुप रहकर भी सूनी आंखें,

बातें कितनी कह जाती हैं।

 

ना करना ऐसा व्यवहार,

मन उनका टूट जाए।

एक कठोर वचन भी उनके,

वर्षों का सुख लुटाए।

 

आज समय है हाथ पकड़कर,

कुछ पल उनके साथ बिताओ।

थकी कहानी बीते वर्षों की,

बैठो और प्रेम से सुनाओ।

 

फिर आ सकती है धन-दौलत,

बीते पल लौट न पाएँ।

अपने हमसे जो दूर हुए तो,

फिर आवाज कहाँ दे पाएँ?

 

एक दिवस के फूल न देना,

जीवन भर सम्मान करो।

जब तक उनके नयन खुले हैं,

तब तक उनका मान करो।

 

वरिष्ठों के अनुभव में ही,

जीवन का विस्तार मिले।

इनके चरणों की सेवा से,

मन को सच्चा प्यार मिले।

 

जिन्होंने जीवन अपना दे डाला,

उनको जीवन भर सम्मान मिले।

जिनके कारण घर है घर-सा,

उनको खुशियों का संसार मिले।

 

संध्या के इन थके दीपों को,

अपनेपन का उजियार मिले।

जिन्होंने जीवन अपना दे डाला,

उनको जीवन भर सम्मान मिले।।

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

चन्दौसी जनपद संभल

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