मँहगाई-विषय पर मेरे विचार कुछ हटकर हैं
चलो आज इसी बहाने
उससे रूबरू कराते हैं।
मँहगाई की मार बड़ी है,
ऐसा सब ही कहते रहते,
फिर खरीद-फरोख्त अति की क्यों करते,
चिंतन का तो विषय यही है।
पहले दो-चार जोड़ी कपड़ों में वर्ष गुज़र जाता था,
अब तो अलमारी खुलते ही कपड़ों के ढेर गिरे पड़ते हैं।
घर का भोजन नहीं भाता है, ऑनलाइन मँगवाते हैं,
या रेस्टोरेंट में जाते है़।
ये तो केवल दो उदाहरण, ऐसे जाने कितनी और मिसालें हैं।
विज्ञापन के वशीभूत हो अनावश्यक व्यय करते हैं।
माना मँहगाई है तो जेब भी भरी है,
फिर रोना-धोना क्यों करते हो।
वेतनमान की भी तुलना करना सीखो,
यदि कीमतें तुम तौलते हो।
आय-व्यय का ध्यान रखो,
आवश्यकताओं पर नज़र धरो।
बेमतलब दुखियारा बनने से बेहतर है,
ज़रूरत के हिसाब से चलो,
परिस्थितियों के संगी बनो।
मँहगाई तुम्हें न तोड़ सकी,
तुम मँहगाई को जोड़ रहे हो।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, © ®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।






